Bindash News || मेरे गांव के तीन पेड़...
    

    
    

    
    

    
    
    






       
        
        
 


    

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मेरे गांव के तीन पेड़...

Bindash News / 15-05-2021 / 914


काश लौट आते वो बचपन वाले दिन: विनय चौबे


आशुतोष रंजन
गढ़वा

वर्तमान गुज़रते इस कोरोना काल में शहर में रहना दुश्वार हो गया है,ऐसे में कई परिवार ऐसे हैं जो अपने पैतृक गांव में समय बिता रहे हैं,उन्हीं परिवारों में से एक नाम आता है भाजपा के प्रदेश कार्यसमिति सदस्य विनय चौबे का,जो वक्त बे वक्त तो गांव जाते रहते हैं लेकिन इस वक्त वो अपने गांव में हैं,यहां पर हम यह भी जरूर कहना चाहेंगे कि लोग गांव में गए जरूर हैं,वहां समय भी गुजार रहे हैं लेकिन वहां भी वो घर की देहरी से तनिक भी बाहर निकलना गंवारा नहीं कर रहे,पर विनय चौबे द्वारा अपने गांव में निकल जहां एक तरफ़ अपने गुज़रे बचपन को याद किया जा रहा है तो वहीं उस वक्त की मौजूद निशानी को दिली संज़ीदगी से देखते हुए उसे कैमरे में याद के रूप में कैद भी किया जा रहा है,इसी दरम्यान कई ऐसे पल भी आ रहे हैं जब वो उस वक्त की निशानियों को देख भावुक भी हो रहे हैं,ऐसा ही एक क्षण तब आया जब उन्हें बचपन के वो तीन पेंड़ याद आये जहां वो बालपन वाला खेल खेला करते थे,उस याद को उनके द्वारा शब्दों में किस तरह पिरोया गया आइये आपको भी पढ़ाते हैं।

यही पेंड़ तो एक वक्त पहचान थे गांव के:- विनय चौबे लिखते हैं कि मेरे गांव में अवस्थित वो तीन पेंड़ एक वक्त गांव के पहचान हुआ करते थे,बरगद बहुत बड़ा था,उस जैसे बड़ा बरगद का पेड़ पूरे इलाके में नहीं था,पेड़ एक बिगहा जमीन को घेरे हुए था।पेड़ के जड़ के पास बहुत बड़ा और चिकना चौकोर पत्थर था,जिसपर उस टोले के अलावे गांव के अन्य बच्चों का जमावड़ा लगता था।उसके आस पास छोटे पत्थर भी हुआ करते थे, गर्मी के दिनों में उम्रदराज महिलाओं की मंडली बैठी रहती थी।खूब छायादार और आनन्ददायक जगह ।उस पेड़ के नीचे तजीया का चबूतरा और तजिये का घर भी।जड़िया घर मेरे गांव का पहला विद्यालय वहीं खुला,जो बाद में अन्य जगह स्थांतरित हुआ।यह पेड़ मेरे घर के ठीक पास था, जहां बचपन का ज्यादा समय वहीं गुजरा।अब ना तो वह पेड़ है और ना चबूतरा,घर तथा बड़ा पत्थर,समय के साथ बदल गया।अब अगर बचा है तो जिसकी चालिस से उपर उम्र होगी,अब केवल स्मृतियां।

दूसरा पेड़ गोदाम पीपर,जो बहुत बड़ा और उसके जैसे अन्य पीपल का पेड़ पूरे इलाके में नहीं होगा।गोदाम पीपर नाम कैसे पड़ा कह नहीं सकते,संभवतःवहां कोई गोदाम हमारे याद से पहले रहा होगा।भंवर का झूंड बीसो तना में,छायादार जबरजस्त।उस पर चढ़ना बहुत मुश्किल।कुछ थे जो चढ़ पाते थे,वे बहादुर माने जाते थे।अब केवल स्मृतियां शेष रह गयीं।

तीसरा पेड़ मीठकी आम का,मुझे लगता है ऐसा आम न केवल इस जिले में बल्कि पूरे राज्य में नहीं होगा, जहां तक मेरी जानकारी है।यह पेड़ हमारे परिवार के ही किसी का व्यक्तिगत है किन्तु उसके फल का हक पूरे गांव के लोगों का होता है।वह पेड़ आज भी है लेकिन उसका वह रूतबा नहीं रहा।आपको लगेगा कि इस पेड़ की क्या खूबी है जो राज्य में नहीं होगा।यह आम का फल कितना भी खा लिजीए दांत खट्टा नहीं होगा।आधा किलो तक का होता था लेकिन उसके अंदर गुठली नहीं देखा।मीठास इतनी की कभी पकते तक पेड़ में नहीं रह सकता,स्वयं पेड़ से गिर जाए।उसके वंश बढ़ाने के ख्याल से जाब लगाकर टहनी से टिकाया गया,एकाध पकहड़ बनाया गया,जिसे कहीं लगाया भी गया है किन्तु वैसा मीठा नहीं हो सका।जब पेड़ में फल आ जाए तो गांव के अधिकांश बच्चे उसी पेड़ के आस पास रहते।हर बच्चे के हांथ में पत्थर और डंडा जिससे तोड़ा जा सके।उसकी रखवाली भी परिवार के एक बाबा करते थे।अगर बोल जाएं तो पूरा गांव तक उनकी कड़क आवाज पहुंच जाए।उनकी भी आदत हो गयी थी हमसबों को झेलने की।उनका लम्बा चौड़ा आकर्षक व्यक्तित्व आज भी याद आता है।पूरे गांव में उनका बड़ा अदब था,चाहे परिवार,समाज हो या अन्य वर्ग।मीठकी आम के मालिक वे ही थे, किन्तु गांव और रिश्तेदारों में बंटवाना कभी भूले नहीं।
आम तो बहुत खाया और देखा पर वैसा नहीं।अब वह भी बहुत बूढ़ा हो गया,सौ के पार।इस लिए अब फल भी न के बराबर।

हम आप इसे लॉकडाउन में मन बहलाना ना समझें तो बेहतर,इसे इस रूप में समझा जाये और महसूस किया जाए तो ज़्यादा बेहतर होगा,क्योंकि आज आर्थिक स्थिति सुदृढ और शहरों की चकाचौंध ने सभी को गांव से दूर कर दिया है,लेकिन इस महामारी ने इल्म करा दिया कि शहर अगर आपके सर से छत हटा दे तो आपका गांव आपको आसरा देगा,शहर में मौत मिलेगी तो गांव जीवन देगा,शहर कोलाहल पैदा करेगा तो गांव सुकून देगा,तभी तो आज कई परिवार अपने गांव पहुंच सुकून पा रहे हैं,लेकिन अफ़सोस कुछ लोग गांव में पहुंच तो गए हैं पर वो ख़ुद को गांव का अहसास नहीं करा पा रहे हैं,वैसे लोगों को ही इस याद के जरिये एक बड़ी सिख देने का काम किया है विनय चौबे ने,उनके द्वारा बता दिया गया कि आप अगर गांव लौटे हैं तो ज़रा गांव में गुजारे हुए बचपन को तो याद कीजिये,बड़ा आनंद आएगा।

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