Bindash News || भला कैसे मर जायेगा यह सत्येंद्र नाथ
    

    
    

    
    

    
    
    






       
        
        
 


    

Economy

भला कैसे मर जायेगा यह सत्येंद्र नाथ

Bindash News / 10-06-2021 / 1279


बेअसर हुई एक कि बद्दुआ,असर कर गयी लाखों की दुआ


आशुतोष रंजन
गढ़वा

वर्तमान गुज़रते इस कोरोना दौर में अपनों की बात कौन करे दुश्मन को भी बैर भुला सबकी ख़ैर मांगते देखा गया,लेकिन यहां देखिये वो मेरी मौत की दुआ मांग बैठे,पर जब तलक मौत निश्चित ना हो तो भला मैं कैसे मर जाता,उक्त बातें पूर्व विधायक सत्येंद्र नाथ तिवारी ने अपने आवास पर Bindash News से ख़ास बातचीत के दरम्यान कही,क्या कहा उन्होंने आइये आपको बताऊं।

सत्येंद्र तिवारी जिंदा हैं हो
:- मैं नहीं कर रहा उनके इस कृत्य की निंदा,जो हर रोज़ मांगते थे सबूत मेरे होने का ज़िंदा",जी हां आप सबों को तो मालूम है कि मुझे भी कोरोना हुआ था,कुछ दिन घर में आइसोलेट रहने के बाद जब हालात में सुधार नहीं हुआ तो मैं रांची प्लस में एडमिट हुआ,कुशल डॉक्टरों के निर्देशन में इलाज़ हुआ और मैं संक्रमण की जद्द से बाहर आया,मेरे स्वस्थ होने में बेहतर इलाज़ का प्रभाव तो है ही लेकिन उससे कहीं ज़्यादा असरकारी हुआ है लाखों लोगों की दुआ,जो प्रतिरोज़ नहीं बल्कि प्रतिक्षण मेरे स्वस्थ होने की कामना किया करते थे,लेकिन बड़ा अजीब लगा यह जानकर की एक शख़्श ऐसा भी है जो मेरे मरने की जहां एक ओर दुआ किया करता था,वहीं हर रोज़ सुबह जगने के बाद पानी पीने के पहले किसी अपने को फ़ोन कर बस यही पूछा करता था कि मैं ज़िंदा हूं या मेरी मौत हो गयी,उनके पूछने का तरीक़ा भी बड़ा दिलचस्प था,अपने को फ़ोन लगाने के साथ ही का जी सत्येंद्र का क्या हाल है.?,सुनने में आ रहा है कि का तो बहुत ज़्यादा बीमार है,बच जाएगा क्या.?,तो सामने वाले का ज़वाब मिलता की जानकारी मिली है कि अभी इलाज़ चल रहा है,मतलब की अभी तक ज़िंदा हैं,इस तरह रोज़ की दिनचर्या बना उनके द्वारा मेरे ज़िंदा होने से ज़्यादा मेरे मर जाने की ख़बर सुनने की उत्सुकता बनी रही,लेकिन अफ़सोस उन्हें मन मसोस कर रह जाना पड़ा क्योंकि मेरे मरने की ख़बर जो उन्हें नहीं मिली।

भला कैसे मर जायेगा यह सत्येंद्र नाथ
:- जब सबकी दुआ है मेरे साथ तो भला कैसे मर जायेगा यह सत्येंद्र नाथ",उक्त पंक्ति के साथ गढ़वा के पूर्व भाजपा विधायक सत्येंद्र नाथ तिवारी ने कहा कि "कैसे असर कर जाए किसी एक कि बद्दुआ,जब हमारे साथ है लाखों की दुआ",अरे भाई सत्येंद्र नाथ एक व्यक्ति मात्र नहीं एक स्वस्थ विचार है,और स्वस्थ विचार कभी मरता नहीं,मुझे ज़िंदा होने की ख़ुशी से कहीं ज़्यादा अफ़सोस इस बात का है कि तुम्हारी दुआ बेकार चली गयी,बहुत मेहनत लगता होगा रात दिन मेरे मरने की दुआ करने के साथ साथ हर सुबह जग कर यह जानकारी लेना कि मैं ज़िंदा हूं या मर गया,और फ़िर अफ़सोस करते हुए फ़ोन रख कर निराशा में डूब जाना,यही कुछ नियति बन गयी थी,लेकिन मैं कैसे मर जाता,क्योंकि अभी मुझे अपने क्षेत्र के लिए बहुत कुछ करना बाकी है,अनगढ़ गढ़वा को नए आयाम के साथ गढ़ना बाक़ी है,साथ ही यह कह दूं कि "चला हूं मुट्ठी भर अभी,चलना मिलों अभी बाक़ी है,छुआ हूं जमीं को यारा,पाना आसमां को अभी बाक़ी है।"

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