Bindash News || Bindash ख़ास: अब पढेंगें देवव्रत और देवराज
    

    
    

    
    

    
    
    






       
        
        
 


    

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Bindash ख़ास: अब पढेंगें देवव्रत और देवराज

Bindash News / 29-06-2021 / 754


अधिकारी के अच्छी सोच का आ रहा बेहतर परिणाम
 


आशुतोष रंजन
गढ़वा

कहीं भवन था पर वो स्कूल नहीं था और कहीं स्कूल था पर ना तो वहां शिक्षक थे और ना ही उनसे पढ़ने वाले बच्चे,कुछ ऐसी विषम हालात वाली अव्यवस्था हमारे यहां जड़वत थी,इसी शैक्षणिक व्यवस्था में गुणात्मक सुधार हो और बच्चों का सही मायने में स्कूल से जुड़ाव हो इस उद्देश्य से सर्व शिक्षा अभियान की शुरुआत हुई,जिन स्कूलों में शिक्षकों बिना पढ़ायी नहीं होती थी वहां पारा शिक्षकों की बहाली हुई,और बच्चों के स्कूल से जुड़ाव को ले कर इस अभियान में बल दिया गया,परिणाम हुआ कि स्कूल से ना जुड़ पाने और स्कूल छोड़ देने वाले बच्चे भी स्कूल से जुड़े और पढ़ायी शुरू किए,लेकिन बाद में फ़िर व्यवस्था में शिथिलता आयी और एक बार फ़िर से कुछ बच्चों का स्कूल से मोहभंग हुआ और वो पढ़ायी छोड़ दिये,तो कुछ ऐसे भी हैं जिनका नाम अभी भी स्कूल से जुड़ नहीं पाया है,कारण है इस ओर से विभाग सर्वथा मौन है,पर यह शायद कालांतर की बात हो गयी,क्योंकि झारखंड के गढ़वा जिले में एक ऐसे व्यक्ति को शिक्षा विभाग के अधिकारी यानी जिला शिक्षा अधीक्षक एवं जिलाव शिक्षा पदाधिकारी का प्रभार मिला है जिनके दिल में कुछ बेहतर करने का सोच और उसे मूर्तरूप देने का जज़्बा है,हम बात यहां संजय पांडेय की कर रहे हैं,उनके द्वारा ऐसी कौन सी पहल की गयी,आइये आपको इस ख़ास ख़बर के जरिये बताते हैं।

 

अब पढेंगें देवव्रत और देवराज:- हमने अपने ख़बर का शीर्षक दिया है कि अब पढेंगें देवव्रत और देवराज,तो आप बेशक सोच रहे होंगें की कोई पढ़ायी से वंचित था और अब वो पढ़ेगा,तो आपका ऐसा सोचना बिल्कुल सही है,हमारी यह स्टोरी उन दो बच्चों देवव्रत और देवराज पर ही केंद्रित है जो पढ़ायी से महरूम थे,लेकिन अब वो स्कूल जायेंगें और पढ़ायी शुरू करेंगें,अब सवाल उठता है कि ये संभव कैसे हुआ तो,आपको बताऊं की यह जिला शिक्षा पदाधिकारी संजय पांडेय द्वारा शुरू की गयी एक विशेष मुहिम का असर है,कैसे उसे हम नहीं ख़ुद पदाधिकारी ही बता रहे हैं,उनके द्वारा अपने फेसबुक में एक पोस्ट लिखा गया कि बात कल और परसों की है लेकिन यहां साझा करने का समय नहीं मिला,आज सोचा कि इसे फेसबुक पर पोस्ट कर देता हूं,क्या पता इससे मेरे जिले के दूसरे शिक्षक या अन्य जिलों के कर्मचारी और शिक्षकगण भी प्रेरणा ले सकें,दरअसल मैंने पिछले सप्ताह अपने जिले के हर विद्यालय में "नामांकन सप्ताह" मनाने का निर्देश जारी किया था,ताकि कोई पात्र बच्चा नामांकन से न छूट जाए,उसी क्रम में न केवल प्रधानाध्यापकों और शिक्षकों ने अपने अपने स्तर पर मुहिम चलायी बल्कि हमारे ब्लॉक एजुकेशन ऑफिसर्स ने भी नामांकन को लेकर एक सकारात्मक माहौल बनाया,शनिवार को हमारे एक ब्लॉक लेवल एजूकेशन ऑफिसर राकेश कुमार ने दो बच्चों को लकड़ियां ले जाते हुए देखा,बात करने पर उन्हें पता चला कि दोनों बच्चे विलुप्त होती आदिम जनजाति कोरवा समुदाय से हैं,दोनों बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं,उनसे नाम पता पूछा तो उन्हें ज्ञात हुआ कि बगल के जंगल में ही अपनी नानी के घर पर वे लोग रहते हैं (उक्त सारी जानकारी उन्होंने मुझे भी फोन पर दी)

मैंने उनसे कहा कि वो इन बच्चों के परिजनों से संपर्क कर अनिवार्य तौर से नामांकन करें और शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ें,उन्होंने त्वरित अनुपालन करते हुए अगले दिन बच्चों के पिता सहित अन्य परिजनों से न सिर्फ मुलाकात की बल्कि उन्हें शिक्षा का महत्व भी समझाया,इतना ही नहीं रविवार होने के बावजूद विद्यालय खुलवाकर उनका नामांकन करवाया,उन्हें ड्रेस,जूते, पाठ्य पुस्तकें आदि मौके पर ही प्रदान कीं,उक्त प्रक्रिया के बाद बच्चों का उत्साह देखने लायक था,देवव्रत और देवराज नाम के दोनों भाइयों के नामांकन रजिस्टर में उनके पिता ने भले ही हस्ताक्षर की जगह अंगूठा लगाया है किंतु उन्हें अपने बेटों के लिये सपने देखने तथा इस तसल्ली का सुखद आधार जरूर मिल गया कि वे निकट भविष्य में अपने बच्चों को साक्षर करने जा रहे हैं,राकेश से अन्य शिक्षकों को भी प्रेरणा लेते हुए हर संभव प्रयास करना चाहिए कि कोई भी बच्चा शिक्षा ग्रहण करने से छूट न पाए,क्या पता किस बच्चे के रूप में कौन सा महान व्यक्ति देश को मिल जाये..।


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