Bindash News || "सुखाड़" की दहलीज़ पर "गढ़वा"
    

    
    

    
    

    
    
    






       
        
        
 


    

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"सुखाड़" की दहलीज़ पर "गढ़वा"

Bindash News / 07-10-2018 / 1042


सुख चले "फ़सल",पड़ी खेतों में "दरार",अब तो हैं "किसान",राहत के हक़दार

 
किसानों के प्रति प्रशासन है गंभीर:डीडीसी
 
आशुतोष रंजन
 
गढ़वा 
 
बारिश नहीं हो तो अकाल,गर हो तब अकाल,यह कोई जुमला मात्र नहीं बल्कि गढ़वा जिले की कोरी सच्चाई है,जहां वर्तमान गुजरते वक्त में अपने सूखते फ़सल को ले कर किसान पूरी तरह हलकान हैं,एक रिपोर्ट
 
फ़िर भी करते हैं खेती:- दशकों से बर्बादी है नियति,फ़िर भी करते हैं खेती",जी हां झारखंड का गढ़वा जिला जहां के लोगों के लिए आजीविका का मुख्य साधन खेती ही है,लेकिन विडंबना इस बात का है कि खेती करने के लिए साधन उपलब्ध नहीं होने से हर साल उनकी फ़सल मारी जाती है,अब उदाहरण के तौर पर इस साल हुई धान की खेती को ही लें,जहां बिचड़ा डालने से ले कर रोपा करने तक समय समय पर हुए बरसात ने किसानों को आह्लादित किया और वो हर्षित हो कर धान का रोपा भी किये,फ़सल बढ़िया उग भी आया,लेकिन आज जब उसे सबसे अधिक और उपयोगी पानी की जरूरत है तो बारिश कोसो दूर है,नतीज़ा है कि फ़सल पूरी तरह सुख रहे हैं,और किसान मारे कष्ट के बेज़ार हैं।
 
किसान हो रहे दोहरे:- मुरझा गए जो खिले थे चेहरे,हो रहे किसान दोहरे",ससमय खेती कर अच्छी फसल होने के भरपूर उम्मीद से किसानों के जो चेहरे कल ख़ुशी से दमक रहे थे आज वो मुरझा गए हैं,कारण की जिस धान के जरिये वो धन उपार्जन की आस लगाए बैठे थे उन्हें अब हांथ से तोता उड़ने सा अहसास हो रहा है,निराश और हताश किसान कहते हैं कि अब वो जाएं तो कहां जाएं।
 
साहब भी हैं वाक़िफ़:- यह ना समझें कि वो हालात से हैं नावाक़िफ़,हैं साहब भी वाक़िफ़",जब हमने इस विषम हालात के बाबत जिले के उपविकास आयुक्त नमन प्रियेश लकड़ा से बात की तो उन्होंने भी स्वीकारते हुए कहा कि निश्चित रूप से वर्षा नहीं होने से किसानों के समक्ष खुद के फ़सल को बचाने की बड़ी चुनौती सामने आन पड़ी है,लेकिन जिला प्रशासन इस निमित्त गंभीर है।
 
वो बनाते नीति कुछ और,पर अफशोस रखते नियत कुछ और हैं,जी हां एक तरफ सरकार किसानों की आय दुगुनी करने के लिए तरह तरह के कवायद कर अपना संकल्प दुहराती है,लेकिन दूसरी ओर सच्चाई है कि किसान आज भी सिचाई सुविधा से कोसो दूर आसमान से राहत की बरसात होने को राह जोहने के लिए मजबूर हैं।
 
 

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