Bindash News || काश "हर रोज़" होती "दिवाली"...?
    

    
    

    
    

    
    
    






       
        
        
 


    

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काश "हर रोज़" होती "दिवाली"...?

Bindash News / 07-11-2018 / 881


गर हालत ना होती माली,तो हम रोज मनाते दिवाली

 
"दिवाली की रात होती है सपनों की रात"
 
आशुतोष रंजन
 
गढ़वा
 
साल में एक रोज़ होने वाली दिवाली काश प्रतिरोज़ होती,तो कम से कम ख़ुद के यहां रौशनी तो होती,क्योंकि चराग मयस्सर नहीं अपने घर के लिए,यह लालसा भरी करुण कसक है गढ़वा के उन गांव के लोगों की जिनके यहां बिजली नहीं है,लोग दिवाली का बड़े ही बेसब्री से राह ताकते हैं क्योंकि साल के 364 दिन स्याह अंधेरे में जीवन बसर करनेवाले लोग मात्र एक ही रोज तो भरपूर रौशनी देख पाते हैं,जिस रोज़ दिए कि हल्की रौशनी में ही सही अपनी जिंदगी में उजाला समाहित हुआ पाते हैं,जहां बिजलियुक्त गांव सहित समूचे देश के लोग नाम का मिट्टी का दिया जला बिजली के झालरों से खुद का घर रौशन कर सुखी सम्पन्न युक्त सुनहरा ख़्वाब देखते सो जाया करते हैं,वहीं ऐसे गांव के लोग अपने घर सहित पूरे गांव गली को मिट्टी के दिये से रौशन कर सोते नहीं बल्कि पूरी रात जग कर उस जलते दिए को देखते रहते हैं,क्योंकि उनके जीवन में एक यही रात तो उनके सपनों की रात होती है,जहां वो पूरी रात उजाले में गुजारते हैं।
होता है पूरे साल इंतज़ार:- करने को इस रात का दीदार,होता है पूरे साल इंतज़ार",जी हां दिवाली के सुबह से ही मन में एक उल्लास के साथ और आंखों में एक अलग नजारा देखने की चमक लिए लोग रात का इंतज़ार करते हैं,जैसे-जैसे दिन गुज़र कर शाम के नज़दीक पहुंचता जाता है लोग आह्लादित होते जाते हैं और जैसे ही रात की शुरुआत होती है उनके खुशियों का ठिकाना नहीं होता,कारण की आज की यह रात रोज की तरह स्याह अंधेरे वाली नहीं बल्कि सफेद संगमरमरी रात होने वाली है और फिर उस अंधेरी रात को उजाले की रात में परिणत करने के लिए लोग जुट जाते हैं और शुरू होता है दिया जलाना,घर की महिलाएं दिए में तेल और बाती लगा देती जाती हैं और क्या बच्चे क्या वयस्क और वृद्ध सभी उस दिए को घर के अंदर से ले कर बाहर तक करीने से रख जलाना शुरू करते हैं।
 
महिलाएं गाती हैं मंगल गीत:- बजने लगता है संगीत,महिलाएं गाती हैं मंगल गीत",एक एक कर घर के अंदर से ले कर बाहर तक दिया जला दिया जाता है,और देखते ही देखते अंधेरे वाला गांव रौशनी से नहा जाता है,बच्चे खुशी के मारे चहकने और उछलने लगते हैं,मर्द संगीत बजाने लगते हैं और महिलाएं मंगल गीत गाने लगती हैं,लोग पूरी रात जग कर उस एक रात के उजाले को पूरे साल के लिए अपनी आंखों में कैद करते रहते हैं,कोई कहीं भी रहता है लेकिन उनकी नजरें बस अपलक उस रौशनी को निहारते रहते हैं जो पूरे एक साल के बाद मात्र एक दिन के लिए आया है।
हम रोज मनाते दिवाली:- गर अपनी हालत ना होती माली,तो हम रोज मनाते दिवाली",जी हां सरकारी रौशनी हमारे लिए भले मोहाल है,लेकिन अगर हम आर्थिक रूप से कुछ हद तक ठीक होते तो एक दिन कौन कहे प्रतिरोज के अंधेरे को दूर कर अपने घर को रौशनी से रौशन रखते,और हमें पूरे एक साल के दर्द पर आज मरहम नहीं लगाना पड़ता,पर यह केवल हमारे सोच तक सीमित है क्योंकि ना तो सरकारी बिजली हमें मिलने वाली है,और ना ही हमारी माली हालत सुधरने वाली है।
 
बरसने लगते हैं वही नज़र:- अभी लरज रही थी जो आंखें,बरसने लगते हैं वही नजऱ",जी हां जो आंखें बस एक रात के उजाले को देख लरज रही थीं,वही नज़र बरसने लगते हैं,क्योंकि जब धीरे-धीरे रात का पहर ख़त्म होने की ओर बढ़ता है लोगों के आंखों में दिखने वाली चमक कम होती जाती है,चहकने वाले चेहरों पर उदासी छाने लगती है,और जैसे ही सुबह की लालिमा आसमां में दिखता है लोग के आंखों से आँशु झरने लगते हैं,क्योंकि उनके ख्वाबों की रात जो गुजर गयी, उनके उजाले की रात जो गुजर गयी,क्योंकि यह जानते हुए की इस रात की सुबह जरूर होगी, लेकिन फिर भी वह नहीं चाहते कि “यह रात कभी हमसे जुदा हो,रहे हम उजालों में सदा, गुजरने वाला हर पल अलहदा।"
 

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