Bindash News || मौत का यह सिलसिला आखिर कब तक...?
    

    
    

    
    

    
    
    






       
        
        
 


    

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मौत का यह सिलसिला आखिर कब तक...?

Bindash News / 31-12-2018 / 1104


गढ़वा में गयी एक मजदुर की जान

सारी सुविधाएं हैं उनसे दूर,तभी तो हैं वह मजदूर 

आशुतोष रंजन 
 
गढ़वा 
 
ना जाने कब तलक बदलेंगें हालात हमारे,कहने को हुक्मरान हमारे रोज बदलते हैं,जी हाँ यह कोई मात्र जूमला नहीं बल्कि झारखंड राज्य के गढ़वा पलामू जिले की करुण सच्चाई है,जहां सबकुछ रहते हुए भी पर्याप्त व्यवस्था बिना दो जून की रोटी के लिए सुदूर प्रदेशों की ख़ाक छानना लोगों की नियति बन गयी है,पर यहाँ अफशोस इस बात का भी है की वहाँ जाने के बाद भी लोगों के हांथों में रोटी नहीं बल्कि पाले में मौत ही आती है,माह और साल गुजरने की बात कौन करे हर सप्ताह दोनों जिलों के गाँव से किसी के मरने की खबर आ जाती है,जानकारी लेने पर मालुम चलता है की वह बाहर प्रदेशों में काम करने गया था कभी किसी का शव उक्त कार्यस्थल से आता है तो कोई बीमार हालत में घर पहुंचता है और यहीं उसकी मौत हो जाती है,ताजा मामला गढ़वा जिले में सामने आया है जहां कांडी प्रखंड क्षेत्र के सेमौरा गाँव में एक मजदुर व्यक्ति की मौत उसके घर पर हो गयी,वह मात्र एक दिन पहले ही बाहर से काम कर के घर को लौटा था,जहां देर रात उसकी मौत हो गयी
 
आज फिर है युधिष्ठिर की तलाश:- कब पूरी होगी हमारी आस,क्योंकि आज एक बार फिर से है युधिष्ठिर की तलाश,जी हाँ अपने यहाँ बदस्तूर जारी मजदूरों के मौत का यह सिलसिला आखिर कब रुकेगा इस यक्ष प्रश्न के जवाब के लिए आज एक बार फिर से लोग युधिष्ठिर की तलाश कर रहे हैं,क्योंकि यह यक्ष प्रश्न अब तलक नाजवाब है,ऐसी बात नहीं की पलायन रोकने की सरकार और सरकारी स्तर पर कोशिश नहीं हुई लेकिन विडंबना इस बात का है की वह प्रयास नेक नियत और इमानदारी से नहीं हुई जिसका नतीजा है की खुद की क्षुधा मिटाने के साथ परिवार के भूख से अकुलाती अतडियों को दो निवाला से शांत करने के लिहाज से अपने यहाँ के युवकों को बाहर प्रदेशों की ख़ाक छाननी पड़ रही है जहां उसे रोटी की जगह बिमारी और फिर पाले में मौत आ रही है,ऐसे में सवाल उठता है की वह किसका साथ और किसका विकास कर रहे हैं 
 
तभी तो हैं वह मजदुर:- सारी सुविधाएं हैं उनसे दूर,तभी तो हैं वह मजदुर,जी हाँ जिन तक सभी सुविधाएं पहुँच रही हैं वह साहेब हैं और जो हक़ होते हुए भी उन सारी सुविधाओं से दूर हैं तो वह अपने यहाँ कहलाते मजदुर हैं,यही सच्चाई है,इससे हम चाह कर भी मुंह मोड़ सकते,लेकिन जिनके कन्धों पर इन मजदूरों की स्थिति बदलने की जिम्मेवारी है वह मुंह मोड़ना कौन कहे उनके तरफ देखना भी गंवारा नहीं कर रहे,नतीजा है साहेब और बाबुओं के यहाँ इन्ही के बदौलत तरक्की की महफ़िल सज रही है और वहीँ अभागे मजदूरों की चिता सज रही है
कालान्तर से वर्तमान हुआ,बहुत दशक गुजर गया,लेकिन हम तो अभी भी कहेंगें की कुछ समय नहीं बिता है,अभी भी वक्त है अपने हुक्मरान और उनके सागिर्दों को खुद की नियत साफ़ और प्रयास इमानदार करने की,ताकि मजदूरों की चुकती साँसों की डोर को थामा जा सके ?
 

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