Bindash News || "गढ़वा" कब तलक जलाए "ढिबरी"..?
    

    
    

    
    

    
    
    






       
        
        
 


    

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"गढ़वा" कब तलक जलाए "ढिबरी"..?

Bindash News / 24-05-2019 / 1854


क्यों महरूम है हमसे बिजली


आशुतोष रंजन
गढ़वा

उधार की बिजली का करते हैं हम नक़द भुगतान,फिर भी रौशनी के लिए होते हैं हलकान",जी हां आज इस जुमले को इसलिए दुहराया की गढ़वा आज भी पर्याप्त बिजली पाने से महरूम है,और यह स्थिति तब है जब गढ़वा उधार की ही बिजली सही उसे पा कर नकद भुगतान करता है फिर भी पर्याप्त रौशनी से कोसो दूर रहता है,दशकों से बिजली देने का गुहार लगा लगा कर आजिज आ चुके शहर के लोग एक बार फिर से आक्रोशित हो गए हैं,क्या कहना है लोगों का जानने के लिए पढ़िए यह रिपोर्ट-

कब तलक जलाएं हम ढिबरी:- कोई तो करे रौशनी की रहबरी,जलाएं कब तलक हम ढिबरी,इस पंक्ति के साथ आज हर आक्रोशित हुक्मरान से सवाल कर रहा है जिनके द्वारा पिछले सत्रह सालों से बिजली के लट्टुओं के जलने का हसीन ख़्वाब दिखाया जा रहा है,पर इसे विडंबना ही कहेंगें की ख़्वाब पूरा होने की जगह वह दिवास्वप्न बन कर रह गया है,नतीजा है कि पड़ोसी राज्य यूपी और बिहार से उधार में मिलने वाली बिजली से गढ़वा आधा दिन और आधी रात में जीवन बसर करने को विवश है,इस विषम हालात से उबारने के लिए आक्रोशित लोगों का कहना है कि आख़िर अब और कितना इंतज़ार,परेशानी से आजिज हमलोग जब प्रतिरोज घुट घुट कर मर ही रहे हैं तो इससे बेहतर है सामूहिक रूप से ही हम सभी अपना प्राणांत कर दें,साथ ही कहा कि हमलोगों का आंदोलन तब तलक जारी रहेगा जब तक गढ़वा को माकूल बिजली की आपूर्ति शुरू नहीं हो जाती।

हर कोई है परेशान:- हर कोई है हलकान,हर कोई है परेशान",जी हां क्या आम क्या खास सभी बिजली की अनियमित आपूर्ति से आज सालों से परेशान और हलकान हैं,चार राज्यों की सीमा पर अवस्थित गढ़वा को व्यवसायिक जिला के रूप में जाना जाता है,अब ऐसे में बिजली के नहीं रहने से व्यवसाय कितना प्रभावित होता होगा यह सोचने की बात है,युवा प्रगतिशील व्यवसायी दौलत सोनी कहते हैं कि सबकुछ रहते हुए भी बिजली के बिना गढ़वा का व्यवसाय बहुत ज्यादा प्रभावित हो रहा है,उधर सात्विक इलेक्ट्रॉनिक के राजेश सिंह कहते हैं कि हमलोग कहने मात्र को इक्कीसवीं सदी में हैं लेकिन हर पल खुद को सत्रहवीं सताब्दी में महसूस करते हैं क्योंकि आज भी ढिबरी ही सहारा बना हुआ है,वह भी कहते हैं कि बिजली बिना व्यवसाय हासिये पर जा रहा है,अधिवक्ता सह समाजसेवी जितेंद्र सिन्हा

कहते हैं कि बच्चों की पढ़ायी के साथ साथ घरेलू काम और व्यवसाय सब बिजली बिना पूर्ण रूप से प्रभावित हो रहा है,सरकार आश्वासन के जरिये आज दशकों से वायदों की बिजली जला रही है,इसे विडंबना ही कहेंगें की वह चाहे संसदीय चुनाव हो या विधानसभा का चुनाव सभी में बिजली एक प्रमुख मुद्दा रहता है पर अफसोस चुनाव बाद बात आयी गयी वाली हो कर रह जाती है,और समस्या यूं ही जड़वत रह जाता है,वह कहते हैं कि अब जरूरत है आंदोलन को मजबूती से अनवरत जारी रखते हुए सबकुछ ठप करने की तभी सरकार और सरकारी महकमे की तंद्रा टूटेगी,उधर बिजली को ले कर हर वक्त मुखर रहने वाली समाजसेविका अनिता दत्त ने कहा कि आज बिजली के बिना पूरा गढ़वा तंग तबाह है,परेशान और हलकान हो कर शुरू किए गए इस आंदोलन को सभी को सहयोग करना चाहिए,ताकि आंदोलन आगे बढ़े और सरकार गढ़वा को पूर्ण रूप से बिजली देने के लिए विवश हो।

साल पूरा सवाल अधूरा,जी हां राज्य को वजूद में आये हुए आज उन्नीसवां साल पूरा होने को है पर इन गुजरे अवधि में सवाल अधूरे हैं,उस में से सबसे ज्यादा प्रमुख बिजली है,ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर बिजली जैसे उन्नीस साला ज्वलंत सवाल का माकूल जवाब कब मिल पाता है ?

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