Bindash News || हम "पत्रकार" हैं, "सरकार" नहीं..?
    

    
    

    
    

    
    
    






       
        
        
 


    

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हम "पत्रकार" हैं, "सरकार" नहीं..?

Bindash News / 21-07-2019 / 1331


खेती में जुटे किसान, पर लगा है "पानी" पर घ्यान


आशुतोष रंजन
गढ़वा

गढ़वा और पलामू झारखंड के दो ऐसे जिले हैं जहां किसानों के लिए खेती करना जुए के समान हैं,क्योंकि बरसाती पानी के भरोसे खेती करने वाले किसानों को यहां खेती के बिसात पर जीत कम हार ज्यादा हाथ आता है क्योंकि उन्हें ससमय बारिश का लाभ नहीं मिलता,अब इस साल कुछ बारिश क्या हुई एक बार फिर किसानों ने खेती की शुरुआत कर दी है लेकिन उनके मन में क्या है आइये जानते हैं इस रिपोर्ट से।

पर लगा है पानी पर ध्यान:- खेती में जुटे किसान,पर लगा है पानी पर ध्यान",जी हां एक बार फिर किसानो ने खेती शुरू कर दिया है,फिर से खेतों का सीना चीरने कि प्रक्रिया शुरू कर दी गयी है,कहीं हल चल रहे हैं तो कहीं ट्रैक्टर से खेतों की जुताई हो रही है,बदरा से पहली बारिश क्या हुई किसान अपने पूरे परिवार के साथ खेतों में उतर गए,और शुरू कर दी खेती,आपको यहां बता दें कि गढ़वा में इसी तरह पहली बारिश किसानों को खेती के लिए फांस दिया करता है,किसान खेतों की जुताई के साथ साथ घर में रखे बीजों के अलावे बाहर से भी खरीदी कर उसे खेतों में फेंक दिया करते हैं,एक आस के साथ अब दूसरी तीसरी बारिश होगी और हमारी खेती पूर्ण होगी,लेकिन फ़िर बारिश होने की आस कभी पूरी नहीं होती और यहीं पर ग़रीब किसान खेती की शतरंजी बिसात पर अपनी बाजी हार जाते हैं,मायुष हो एक कसक के साथ वह कहते हैं कि ऊपर वाले के भरोसे पर खेती किया करते हैं,वो कहते हैं कि हम खेतों में नीचे देखते हुए हल चलाते हैं लेकिन कभी कभी ऊपर आसमान की ओर भी देख लेते हैं क्योंकि अपना पूरा ध्यान तो बरसाती पानी पर टिका होता है,साथ ही कहते हैं कि अब ऊपरवाला ही जाने कि पैदा होगा या नहीं ?

हम पत्रकार हैं सरकार नहीं:-सब ताल,तलैया सूखे पड़े हैं,हर घाट गगरिया प्यासी है,खिलने थे जिस चेहरों को,देखो उस पर छायी उदासी है",आज कई दशक गुजर गए पर गढ़वा पलामू के किसानों के चेहरे पर खेती ने जो चिंता की बड़ी लक़ीर खींची है वह अब तलक ख़त्म नहीं हो पायी है,यह और बात है कि हर साल किसान बुझे हुए चेहरे पर आशा भरी एक मुस्कान ला खेती को खेत में उतरते हैं इस विश्वास से की शायद इस बार खेती हो जाये और पैदावार हाथ आ जाये,लेकिन यह ख़्वाब कभी पूरा नहीं होता क्योंकि जड़वत हालात के कारण उनका देखा हुआ ख़्वाब हर बार की तरह दिवास्वप्न बन कर रह जाता है,और क्षण भर के लिए आयी मुस्कुराहट उनके चेहरे से गायब हो जाती है और फिर वही वही पुरानी मायूसी घर कर जाती है,आज दशकों से किसान बस वही एक सवाल हम कलमकारों से तब पूछा करते हैं जब हम उनके पास खेती के इस शुरुआती मौसम में उनतक खेती को ले कर खबर करने पहुंचते हैं,वो एक कसक के साथ पूछते हैं कि आख़िर कब हमारे खेतों को भी पानी मिलेगा और कब हमारे खेत बजंर के कलंक से मुक्त हो कर फसल उगाएंगें,लेकिन उनके इस सवाल का जवाब हम नहीं दे पाते,हम ऐसा भी नहीं बोल पाते कि अब आपको चिंतित होने की जरूरत नहीं है क्योंकि आप के खेतों तक सोन और कोयल जैसी नदियों से पानी पहुंचाया जाएगा,क्योंकि हम पत्रकार हैं सरकार नहीं?

शुरुआत में हुई बारिश को शुभ मानते हुए किसानों ने खेती की शुरुआत तो कर दी है लेकिन क्या आगे भी उनकी खेती के लिए बारिश मयस्सर हो पाता है और उनके हाथ पैदावार आ पाता है यह देखने वाली बात होगी।

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