Bindash News || चिंता ने "कैंसर" बन कर "अजय" को मारा
    

    
    

    
    

    
    
    






       
        
        
 


    

State

चिंता ने "कैंसर" बन कर "अजय" को मारा

Bindash News / 23-08-2018 / 769


"काश अनपढ़ होते,तो पारा बनने से बच जाते"
"बच्चे रो रहे रोना,लाएगा कौन अब मेरा खिलौना"
आशुतोष रंजन 
 
गढ़वा 
 
जब किसी गरीब लाचार की मौत अर्थाभाव में इलाज के बिना हो जाया करती है तो मैं अक्सर एक पंक्ति लिखा करता हूं कि भगवान जन्म दे तो ग़रीबी ना दे,गर दे ग़रीबी तो बीमारी ना दे,क्योंकि ऐसे विषम हालात में गरीबों के पाले में आगे की ज़िंदगी नहीं बल्कि मौत आती है,एक बार फिर इस पंक्ति को लिखने के लिए मुझे इसलिए विवश होना पड़ा कि एक गरीब और हालात से लाचार ने ग़रीबी की दहलीज़ पर तड़पते हुए दम तोड़ दिया,कौन था वह ग़रीब और किन हालातों से था लाचार जानने के लिए पढ़िए यह ख़ास रिपोर्ट
 
अभिशाप है ग़रीबी:- वरदान है अमीरी तो ग़रीबी अभिशाप है,देती नहीं ज़िंदगी,लाती मौत के पास है,जी हां ग़रीब होना कितना कष्टकर है कोई गढ़वा जिले के अकलवानी गांव के उस घर में जा कर देखे जहां अजय नाम के एक ग़रीब लाचार पेशे से पारा शिक्षक की अर्थाभाव में इलाज के बिना मौत हो गयी,जिनका परिवार बेसहारा हो गया,बच्चे अनाथ हो गए,लेकिन मैं यहां ग़लत कह रहा हूं कि कोई जा कर उस हालात को नजर करे क्योंकि अगर देखी गयी होती तो उन्हें आगे का जीवन नसीब होता न कि उनकी मौत होती,तो ऐसी होती है ग़रीबी जहां लोगों को सहायता के लिए राह ताकते अपनी जान देनी पड़ती है।
 
काश वह अनपढ़ होते:- पारा शिक्षक अजय मिश्रा की मौत ने आज राज्य के सभी पारा शिक्षकों और उन सभी ग़रीब युवाओं को यह सोचने पर विवश कर दिया है कि अपने यहां गर शिक्षित हुए तो इसी तरह मौत मिलेगी जबकि अनपढ़ रहे तो एक कुशल ज़िंदगी,आज अनंत में विलीन हो जाने वाले अजय की आत्मा भी कुछ यही सोच कर कुंठित हो रही होगी कि काश वह शिक्षित नहीं हुए होते,अनपढ़ और गंवार रहे होते तो आज परिवार के बीच में होते,हमारे बच्चे अनाथ और बेसहारा नहीं हुए होते,दो सुखी रोटी ही सही हम सबके क्षुधा को तृप्त कर रही होती,कम से कम हमारे बच्चे भूख की आतुरता में किसी खाते बच्चे को निहार तो नहीं रहे होते,लेकिन यह सब तब होता जब मैं अनपढ़ होता ?
 
लाएगा कौन मेरे लिए खिलौना:- बैठ कर एक कोने में,जारी है बच्चों का रोना,लाएगा कौन अब मेरे लिए खिलौना",काश कोई उन रोते बच्चों का चीत्कार सुन पाता,उनके दिल की कसक को खुद के दिल से महसूस कर पाता,जो आज अपने पापा द्वारा सालों पहले लाये गए उस टूटे खिलौनों को हांथों में पकड़ कभी खिलौनों को तो कभी निर्जीव पड़े अपने पिता को निहार रहे हैं,उनके लब ख़ामोश हैं पर उनकी बरसती आंखें बता जा रही हैं कि वो यही कहना चाह रहे हैं कि "अब तो है बस इसे सहेज कर रखना,क्योंकि आएगा नहीं अब कोई नया खिलौना।"
 
मजबूरी के कैंसर ने मार डाला:- लोग कह रहे हैं कि मृतक पारा शिक्षक अजय मिश्रा को कैंसर हुआ था लेकिन मैं यहां कहूंगा कि उन्हें मजबूरी और लाचारी का कैंसर हुआ था,क्योंकि बेरोजगारी के आलम में रोजगार के रूप में पारा शिक्षक बने अजय मिश्रा को उक्त काम ने मजबूती देने के बजाए मजबूर बना दिया,क्योंकि पूरे एक माह काम करने के एवज में मिलने वाला मानदेय जिसे वेतन कहना भी बेमानी होगा ने लाचार और किसी तरह की सुविधा हासिल करने का मोहताज़ बना दिया,कभी ससमय ना मिलने वाला मानदेय अजय को ज़िंदगी में परिवार के साथ अजेय रहने से काफ़ी दूर कर दिया,नतीज़ा हुआ कि एक फुंसी ना ठीक कर पाने की मज़बूरी आगे बढ़ी और कैंसर बन गयी,और उधर खुद के जीवन को साबुत रख परिवार और बच्चों की परवरिश करते हुए अपना फ़र्ज़ पूरा करने में सारी ज़मीन बिक गयी,साथ ही इधर पांच माह से नहीं मिले मानदेय के अब मिल जाने की आस में लिए गए लाखों कर्ज़ के बाद भी मर्ज़ ठीक होने के बजाए बढ़ता गया और जिसकी परिणति मौत से हुई।

Total view 769

RELATED NEWS