Bindash News || एक "पाठशाला" जो सिद्ध हो रहा "संस्कार शाला"
    

    
    

    
    

    
    
    






       
        
        
 


    

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एक "पाठशाला" जो सिद्ध हो रहा "संस्कार शाला"

Bindash News / 21-09-2019 / 1839


अबोध करा गए बड़ों को बोध


आशुतोष रंजन
गढ़वा

सच ही कहा गया है कि जहां एक तरफ सीखने की कोई उम्र नहीं होती वहीं दूसरी ओर आप बड़ों से तो सीखते हैं लेकिन कभी कभी छोटे बच्चे भी बड़ी सिख दे जाते हैं,कुछ ऐसा ही आज झारखंड के गढ़वा में देखने को मिला जहां एक स्कूल के छोटे छोटे बच्चे बड़ों को बड़ी सिख दे गए,आख़िर क्या किया उन बच्चों ने आइये आपको इस ख़ास रिपोर्ट के जरिये बताते हैं।

जो सिद्ध हो रहा संस्कार शाला:- यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं हो रही है कि आज वह गांव का विद्यालय हो या शहर के स्कूल सभी जगह बस बच्चों को शिक्षा देने का कोरम पूरा किया जा रहा है,वह पुरातनी शिक्षा कहीं गुम सी हो गयी है,लेकिन इसी भींड़ में एक ऐसा भी शहरी स्कूल है जो छोटे बच्चों को खेल खेल में शिक्षा देने के साथ साथ संस्कार भी दे रहा है,हम बात कर रहे हैं गढ़वा जिला मुख्यालय से सटे कल्याणपुर गांव में स्थित डीपीएस जूनियर स्कूल की जहां बच्चों को खेल खेल में ही प्रारंभिक शिक्षा दे उनके अंदर शिक्षा ग्रहण करने की बुनियाद मज़बूत की जा रही है,साथ ही उन्हें किस तरह संस्कारवान बनाया जा रहा है,तभी तो हम कह रहे हैं कि है एक पाठशाला जो सिद्ध हो रहा है संस्कार शाला।

अबोध करा गए बड़ों को बोध:- कालांतर का वह ज़माना कहीं खो सा गया जब हम आप संयुक्त परिवार का हिस्सा हुआ करते थे लेकिन आज गुज़रते वर्तमान दौर में एकल परिवार की परिपाटी जड़वत सी हो गयी है,क्या गांव क्या शहर सभी जगह संयुक्त परिवार बिखर सा गया है जिसका सबसे ज़्यादा गहरा असर किसी पर पड़ा है तो वह हैं हमारे बच्चे जो कल संयुक्त परिवार में रह कर पारिवारिक संस्कार सिख संस्कारवान हुआ करते थे आज वही एकल परिवार में रहते हुए संस्कार विहीन हो गए हैं,बस इसी बात को दिली शिद्दत से महसूस करते हुए उक्त जूनियर डीपीएस स्कूल ने अपने यहां पढ़ने वाले बच्चों को शिक्षा के साथ साथ संस्कार भी दे रहा है,स्कूल में रहने के दरम्यान जहां उन्हें परिवार में रहने,सबका आदर सत्कार करने के अलावे सभी संस्कार सिखाये जा रहे हैं वहीं बच्चों को बाहर ले जा कर सामाजिक गतिविधियों से भी वाकिफ़ कराया जा रहा है,स्कूल द्वारा दिया जा रहा संस्कार बच्चों के मन को किस तरह प्रभावित किया है इसका असर आज उस वक्त देखने को मिला जब बच्चों को ले कर उनके शिक्षक शहर में पहुंचे जहां उन छोटे छोटे अबोध बच्चों द्वारा खेलने कूदने में समय ना व्यतीत कर अपना वक्त समाज से वंचित लोगों के बीच गुज़ारा गया,आपको बतावें की वो बच्चे शहर के विभिन्न मंदिरों के अलावे रेलवे स्टेशन,बस स्टैंड और अस्पताल गए जहां वो सीधे वहां बैठे हुए असहाय,लाचार और भिखारियों के पास पहुंचे और उन्हें खाने की सामग्री के साथ साथ पहनने के लिए कपड़े भी दिए,आज जहां इस तरह के अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों में अंग्रेजियत ऐसे घर कर जाती है और वो समाज से इस तरह दूर हो जाते हैं कि समाज के वंचित लोगों की बात कौन करे वो अपने से दूर रह रहे खुद के परिवार का हिस्सा बनना भी पसंद नहीं करते लेकिन इस जूनियर डीपीएस स्कूल प्रबंधन की उन्मुक्त कंठ से सराहना करनी चाहिए जिसके द्वारा पढ़ायी का माध्यम अंग्रेजी रहते हुए भी बच्चों को परिवार और समाज से जुड़ने के साथ साथ उन्हें सनातनी संस्कार दिया जा रहा है,ऐसे में जरूरत है सभी स्कूलों के साथ साथ वैसे परिवार के लोगों को इस स्कूल और यहां के अबोध बच्चों से सिख लेने की जो अपने बच्चों को पुरातनी और हमारे भारतीय संस्कार से ज़्यादा पाश्चात्य सभ्यता से प्रभावित करा रहे हैं।

इनकी भूमिका रही महत्वपूर्ण:-आज बच्चों को स्कूल से बाहर समाज में ले जा कर उन्हें सामाजिकता का बोध कराने में स्कूल के इन शिक्षक शिक्षिकाओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही जिनमें आनंद श्रीवास्तव,किशोर सिंह,कयूम जी,प्रियंका दुबे,कुमारी नेहा सिंह,विनीता गुप्ता,हेमलता दुबे और साक्षी दुबे का नाम शामिल है।

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