Bindash News || पहुंच नहीं पा रही "रोटी" उनके करीब,बे-मौत मर रहे "ग़रीब"
    

    
    

    
    

    
    
    






       
        
        
 


    

Economy

पहुंच नहीं पा रही "रोटी" उनके करीब,बे-मौत मर रहे "ग़रीब"

Bindash News / 28-10-2019 / 1241


सरकार "बहुमत" में,गरीब "अल्पमत" में


आशुतोष रंजन
गढ़वा

बदले नहीं अब तलक हालात अपने,कहने को हुक्मरान हमारे रोज़ बदलते हैं,यह दिली कसक झारखंड के उन गरीबों की है जिनकी परस्थिति बदलने के वायदे के साथ कई सरकारें बदलीं पर अब तक ग़रीबों के हालात नहीं बदले,आलम है कि दो वक्त की रोटी के जुगाड़ में यहां के ग़रीब दो गज क़फ़न के साथ दफ़न होते जा रहे हैं,ताज़ा वाक़्या गढ़वा जिले का है जहां एक ग़रीब की मौत मुफ़्लिसि के आलम में पलायन के कारण हो गयी।

और मर जाते हैं ग़रीब:- पहुंच नहीं पाती रोटी उनके करीब,और मर जाते हैं ग़रीब",झारखंड का गढ़वा जिसे सूखा प्रभावित और बेरोज़गारी,बेकारी वाला जिला कहा जाता है जहां ग़रीबों के सामने कुआं तो पीछे खायी होती है,वह घर रहें तो यहां भी ग़रीबी वाली मौत ग्रास बनाती है तो उधर बाहर जाने पर भी उन्हें मौत ही मिलती है,क्योंकि भूख से अकुलाती क्षुधा को शांत करने के लिए वो सुदूर प्रदेशों में पलायन करते हैं लेकिन अफ़सोस वहां उनके पाले में रोटी कम मौत ज़्यादा आती है,गढ़वा के इतिहास में कई ऐसी मौतें प्रतिरोज़ दर्ज़ हो रही हैं,आज एक और ग़रीब की मौत इस लंबे फ़ेहरिस्त में जुड़ गया,जिले के कांडी प्रखंड अंतर्गत सोनपुरवा गांव निवासी ग़रीब उपेंद्र यादव की मौत भूख से अकुलाती क्षुधा ने ले ली,बेहद ग़रीब वह किसी तरह खुद को जीवित रखे हुए था इस आस में की शायद आने वाला कल उसकी ज़िंदगी को एक नया जीवन दे दे परंतु यह तो उसका दिन वाला दिवास्वप्न साबित हुआ और वह अंततः ग़रीबी वाली मौत का ग्रास बन गया।

पर यहां तो पल पल जा रही ग़रीब की जान:- हर वक्त वह भी जुमला दुहरा रहे जैसे दुहराते हैं हुक्मरान,पर यहां तो पल पल जा रही ग़रीब की जान",किसी ग़रीब की मौत अन्न के अभाव में ना हो ऐसे जुमले राजनेताओं जैसा अब सरकारी महक़मा भी दुहराने लगा है तभी तो ग़रीबों तक उसका हक़ पहुंचाने की जगह उसकी मौत के बाद खुद को दोषवार से बचाते नज़र आता है,लेकिन वस्तुस्थिति बिल्कुल स्याह है क्योंकि यहां रोज़गार का कोई साधन नहीं होने के कारण बेरोजगार दो रोटी के लिए सुदूर प्रदेशों में जाते हैं जहां उन्हें रोटी कम मौत ज्यादा मिलती है,आज की यह मौत तो एकमात्र बानगी है कारण की ऐसी मौतें प्रतिरोज़ होती हैं लेकिन वह किसी की नजर में नहीं आती,लेकिन ऐसे विषम हालात के बाद भी सरकार सबों तक काम पहुंचाने की बात दुहराते हुए खुद का पीठ अपने हाथों थपथपाने से बाज नहीं आती।

मौत तो गरीब की हो गयी,अब उसके उन छोटे छोटे अबोध बच्चों का क्या होगा यह सवाल सबको साल रहा है,ऐसे में ज़रूरत है सरकार और सरकारी महकमे को खुद की जिम्मेवारी नेक नियत और ईमानदारी से निभाने की ताकि कोई ग़रीब बेरोजगारी के आलम में मौत का ग्रास ना बने ?

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