Bindash News || पटना में फ़्लाइवोअर, पंडूका में ‘’कदई’’
    

    
    

    
    

    
    
    






       
        
        
 


    

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पटना में फ़्लाइवोअर, पंडूका में ‘’कदई’’

Bindash News / 03-09-2018 / 980


ख्यालों में विहार करता बिहार
कहिया नाया कपड़ा पहिरब ये माई
आशुतोष रंजन
गढ़वा

के कहेला की बिहार बदल गईल,जहां से चलल रहे ओहिजे पहुँच गईल यह कसक हमारी नहीं बल्कि उन लोगों के दिलों की है जो आज भी उसी पुरातन बिहार में जीवन बसर करने को विवश हैं,और यह तब है जब बिहार के बदल जाने की गाथा राजनीति हलके के साथ मीडिया के द्वारा भी गायी जा रही हा,लेकिन उस गाने की पंक्ति को ना सुनते हुए ज़रा उस हालात को नजर कर लीजिये तो बिहार के विकास की बानगी आपके खुले आँखों के सामने परिलक्षित हो जायेगी,तो आइये हमारे इस खबर के जरिये देखिये बिहार|

विहार करता बिहार :- बस हुक्मरानों के ख्यालों में विहार करता बिहार,जी हाँ हम उसी बिहार की बात कर रहे हैं जिसके बारे में यह कह देना कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी की वर्तमान आधुनिकता में भी पुरातनी जर्जर ना व्यवस्था वाले हालात में जी रहा बिहार,शहर आधुनिकता के चादर ओढ़ रहे हैं जबकि गांव के बदन आज भी खुले में रह कर बदन ढँक जाने की बात जोह रहे हैं,ऐसे में बिहार को बदल दिए जाने की बात उनके जबान से दुहराना क्या बेमानी नहीं लगता ?

पंडूका में कदई:- पटना में फ़्लाइवोअर,लेकिन पंडूका में हैं कदई,इस पंक्ति को तो हमने एक बानगी के रूप में कहा जबकि पंडूका गांव की तरह बिहार में ऐसे कई गांव हैं जो आज उसी पुराने खस्ताहाल व्यवस्था के पाले में जीवन बसर करने को मजबूर हैं,सड़क को विकास का पहला पायदान कहा जाता है,लेकिन जिन गांव के लोगों के लिए एक अदद सड़क ही महफूज नहीं है वहाँ और विकास की बात करना पूरी तरह बेईमानी है,आज उन अविकसित गांव से गुजरने वाले लोग यही कहते हैं की जब पहला पायदान ही नहीं है तो भला विकास उपरी सतह पर आखिर कैसे पहुंचेगा |

आज चाह रहे जुड़ाव:- जिसने चाहा था हमसे दुराव,देखो आज वही चाह रहे हम से ही जुड़ाव,हम बात कर रहे हैं झारखंड बिहार के सीमा पर सोनतटीय गांव की जो आज झारखंड से जुड़ने का ख्वाब देख रहे हैं क्योंकि उन्हें अपने आँखों के सामने कल का पिछड़ा गांव आज तेजी से बदलता दिख रहा है जबकि वो कल जहां थे आज भी वही हैं,अभी हाल में ही यात्रा के दौरान देखने को मिला तो बड़ा ही आश्चर्य हुआ की यह उसी गांव की सड़क है जो सालों पहले चलने लायक नहीं हुआ करती थीं आज तो रेंगने के लायक भी नहीं बचीं,यहाँ आपको बताएं की सोनतटीय जितने भी गांव मिले वो चाहे पंडूका हो या तिलोखर हो या उससे सटे और आगे का जितना गांव सभी सड़क के मामले में बदहाल मिले,लोगों से जब पूछा की बिहार तो बहुत विकास कर रहा है तो फिर ऐसे हालात क्यों तो लोगों ने एक कसक के साथ कहा की बिहार मत कहिये बल्कि यह कहिये की पटना बदल रहा है,कहा की देखिये कैसे हमारे साथ सरकार दोहरी निति अपना रही है,एक तरफ जहां हमारे पैर कीचड़ में सने हुए हैं चलने के लिए दो गज सही रास्ता नहीं है लेकिन हमारे राजधानी में बड़ी बड़ी गाड़ियों को सुरक्षित तरीके से चलने के लिए सड़क से बहुत ऊपर फ़्लाइवोअर बनाया जा रहा है,अगर बिहार बदलता तो हमारे हालात ऐसे नहीं होते,साथ ही कहा की हमलोगों की चाहत है की हमारा गांव पडोसी राज्य झारखंड से जुड़ जाता तो हमलोग भी विकास क्या कहलाता है जान और देख पाते |

नहीं पहनता हूँ उजला लिबास:- होती नहीं पूरी,इसलिए नहीं धरता हूँ कोई आस,बड़ी गंदी हैं सड़कें हमारे गांव की,नहीं पहनता हूँ उजला लिबास,यह करुण कसक है उन गांव के लोगों का जहां के लोगों ने आम दिनों की बात कौन करे त्योहारों में भी नए और उजले लिबास [ कपड़ा ] को पहनना भूल गए हैं क्योंकि उनके कपडे गांव के सड़कों में दागदार हो जाते हैं,व्यस्क और बूढ़े तो हालात से प्रतिक्षण जूझते रहने के कारण खुद को उस हाल में परिवर्तित कर चुके हैं लेकिन उनके बच्चे जब उनसे कपडे पहनने के बाबत पूछते हैं तो वो उन्हें नहीं समझा पाते,बच्चों के इस सवाल का जवाब आखिर कैसे दिया जाए जब वो मासूमियत के साथ पूछते हैं की ‘’ये माई बताओ न गांव में नाया रोड बनी तब हम नाया कपड़ा पहिरब’’

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