Bindash News || क्या यह मात्र घटना है या "साज़िश".?
    

    
    

    
    

    
    
    






       
        
        
 


    

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क्या यह मात्र घटना है या "साज़िश".?

Bindash News / 09-08-2020 / 691


लकवा क्यों मार गया है उनके ज़बान को..?


आशुतोष रंजन
गढ़वा

मैं किसी धर्म,सम्प्रदाय एवं जाती-वर्ग विशेष की वकालत नहीं करता,जिसके कृत्य सही और समाज हित में होते हैं उसकी सहृदय प्रसंशा करता हूं,लेकिन जब किसी की कुत्सित कुकृत्य से समाज को आघात पहुंचता है तो उसकी दिल से मुख़ालफ़त करने के साथ साथ आलोचना करने से भी बाज नहीं आता,आज एक बार फिर से आलोचना के साथ साथ निंदा करते हुए उन्हें एक सख़्त सज़ा मिले ऐसा कुछ लिखने का मौक़ा मिला है,आख़िर वो वज़ह क्या है,जानने के लिए पढ़िए हमारी यह ख़ास रिपोर्ट।

क्या यह साज़िश नहीं तो और क्या:- हर बार इस तरह के कुकृत्य को मात्र एक घटना की संज्ञा देना बिल्कुल सही नहीं है,इसे सोची समझी साज़िश क्यों नहीं कहा जाना चाहिए,इस लेख के शुरुआत से अब तक के लिखे गए बातों को पढ़ने बाद आप यह जरूर जानना चाह रहे होंगें की आख़िर बात क्या है,तो आपको बताऊं की मैं यहां झारखंड के गढ़वा जिले में घटित हुई उन दो घटना की चर्चा से उपजे सवाल के बावत आज बात कर रहा हूं,पहली घटना कुछ दिनों पहले जिला मुख्यालय से सटे कल्याणपुर गांव में घटित हुई जहां काजल नाम की एक लड़की के साथ उस वक्त छेड़खानी करते हुए उसके शरीर से दुपट्टा उतार फेंका गया जब वह अपने भाई के साथ उसी गांव के शिक्षक के यहां पढ़ने जा रही थी,बात दूसरी घटना की करें तो जिले के बंशीधर नगर थाना क्षेत्र के गरबांध गांव से लगे जंगल में घटित हुई,जहां यूपी की दो लड़की के साथ कुल सात युवकों ने गैंगरेप की घटना को अंजाम दिया,पुलिस दोनो घटना में शामिल आरोपियों को गिरफ़्तार तो कर ली,पर यहां हम पुलिसिया व्यवस्था पर सवाल नहीं उठा रहे हैं,दरअसल हमारा यह कहना है कि उक्त दोनों घटना को अंजाम देने वाले कहीं बाहर के नहीं बल्कि इसी जिले के होने के साथ साथ उस मुस्लिम समुदाय से जुड़े हुए हैं जहां एक तरफ़ लड़की और महिलाओं को शरीयत के अनुसार ऊंचा और पाक दर्जा दिए जाने की बात दुहरायी जाती है,लेकिन इन दो घटनाओं के बाद यह कहने में आज मुझे ही नहीं बल्कि हर किसी को कोई गुरेज़ नहीं होनी चाहिए कि मान सम्मान और दर्ज़ा की बात दुहराने के साथ साथ क़ौम के कुत्सित मानसिकता वाले लोग घटना को भी दुहरा रहे हैं।

आज क्यों बंद रखे हुए हैं ज़बान को:- क़ौम का नाम आते ही घटना की निंदा करने के बजाए जो यह कहने में तनिक भी देर नहीं करते कि जानबूझ कर क़ौम को बदनाम करने के साथ साथ ठेस पहुंचाया जा रहा है सम्मान को,लेकिन आज जब दोनों घटना के बाद किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है,तब वो क्यों बंद रखे हैं ज़बान को",जी हां हम बात यहां इस्लाम के सरपरस्तों के साथ साथ शरीयत के जानकारों की कर रहे हैं जो मकतब मदरसों के साथ साथ गांव गांव जा कर पाक कुरान में उल्लेखित जानकारी का इल्म कराया करते हैं,लेकिन इन दो घटना के लगातार घटित होने के बाद तो सवाल उठना लाजिमी है कि क्या वो यही तालीम दे रहे हैं,क्या वो पाक कुरान का हवाला देते हुए हरक़त नापाक़ करना सीखा रहे हैं,क्या अपनों को पर्दा में रखना और दूसरे को बेपर्दा करने की तालीम दे रहे हैं,ऐसे कई सवाल हैं जो आज सबके जेहन में कौंध रहा है,जिसका माकूल जवाब देने से वो कतरा रहे हैं,हां यहां उनके हर बार के उस जवाब से मैं पूरी तरह सहमत हूं कि जिस तरह किसी भी धर्म के कुछ लोगों के गलत होने से पूरा धर्म और जाति गलत नहीं होता ठीक उसी तरह कुछ लोगों के नापाक़ हरक़त से पूरे मुसलमान क़ौम को गलत नहीं ठहराया जा सकता,लेकिन फिर भी कहने को आमादा होना पड़ रहा है कि लगातार इस तरह के कुकृत्य को अंजाम दिया जा रहा है,मगर अफ़सोस इस बात का है कि क़ौम के ख़िदमतगार और सरपरस्तों के जबान को लकवा क्यों मार गया है..?

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