Bindash News || Bindash ख़ास: श्मशान में ख़ुशी के आंशु...
    

    
    

    
    

    
    
    






       
        
        
 


    

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Bindash ख़ास: श्मशान में ख़ुशी के आंशु...

Bindash News / 23-04-2021 / 2072


शर्म करो धर्म की राजनीति करने वालों


आशुतोष रंजन
गढ़वा

ऐसे तो मेरे हर ख़बर का शीर्षक देख कर ही आप मेरे द्वारा लिखे गए ख़बरों को पढ़ने के लिए विवश होते हैं,और जब मुलाक़ात होती है तो इस बात का ज़िक्र भी जरूर करते हैं,मैं दिल से आपका शुक्रगुज़ार हूं कि अपने व्यस्त समय और ज़िंदगी की भागदौड़ के बीच बमुश्किल कुछ वक्त मेरे ख़बर को पढ़ने के लिए निकालते हैं,अब आज के इस ख़बर के शीर्षक को देख निश्चित रूप से आप सोच रहे होंगें की वर्तमान गुज़र रहे वक्त में जहां कोरोना महामारी हर क्षण लोगों की जान ले रहा है,जहां हर चेहरे इस जानलेवा प्रकोप से ख़ौफ़ज़दा और मौत से ग़मज़दा हैं,लोगों के आंखों से बहता पानी रुक नहीं रहा,तो भला ऐसे में किसी ख़बर का शीर्षक श्मशान में ख़ुशी के आंशु देना कितना उचित है,आपका ऐसा सोचना बिल्कुल जायज़ है,लेकिन जब आप इस ख़बर को पढ़ेंगें तो आप भी शीर्षक को सही ठहराते हुए उसे एक बार जरूर दुहरायेंगें,तो आइए आपको उस ख़बर से वाक़िफ़ कराता हूं।

फ़िर भी ख़ुशी के आंशु का गवाह बना श्मशान:- अपने की मौत से बुझ रहे थे दिल के सारे अरमान,फ़िर भी ख़ुशी के आंशु का गवाह बना श्मशान",जी हां यह पंक्ति किसी एक मौत नहीं बल्कि परिवार के किसी सदस्य से अपना साथ छूटता है तो दिल कसक के साथ रोता है,लेकिन जब मां बाप का साया सर से उठता है तो दिल के सारे अरमान बुझने से प्रतीत होते हैं,कुछ ऐसा ही आज पलामू के डालटनगंज में उस वक्त उस बेटे के साथ हुआ जिसके माथे से वो दुलार वाला आसमां के हद से भी बड़ा आंचल हट गया,यानी उसकी मां की मौत हो गयी,यह मौत स्वाभाविक नहीं बल्कि अस्वभाविक हुई,यानी वो कोरोना से संक्रमित हुई थीं,और आज इलाज़ के दरम्यान ही उनका निधन हो गया,जिस तरह वर्तमान वक्त में इस संक्रमण से हर बीमार होने वालों का साथ परिवार वाले छोड़ दे रहे हैं,ठीक उसी तरह जब ये बीमार हुईं तो इनके क़रीबी भी क़रीब आने से परहेज़ करने लगे,और जैसे ही उन्हें आज यह जानकारी हुई कि मौत हो गयी तो फ़िर क्या था अंतिम दर्शन के लिए आने की बात कौन करे उनके द्वारा अपना अपना मोबाइल भी बंद कर दिया गया,शायद उन्हें इसका भी डर था कि माँ जी का संक्रमण कहीं फोन के जरिये हम तक ना पहुंच जाए,कोई आया नहीं और जो लोग जीवित इलाज़ तक अस्पताल में थे वो भी मौत के बाद घर को भाग गए,सबने तो मुंह फेर लिया,भला वो बेटा कैसे मुंह मोड़ता जिसके हंसी चेहरे को देखने के लिए ही तो माँ चारो पहर आस जोहा करती थी,बेटे का चेहरा कभी मुरझाए ना,उस पर मुस्कान पेवस्त रहे इसी ख़ातिर तो वो हर जतन किया करती थी,जब तक बेटा घर नहीं लौट आता तब तक फ़ोन कर के जल्द घर आने और कुछ खाया की नहीं पूछा करती थी,उधर बेटा भी निश्चिंत रहा करता था यह सोचकर कि कुछ देर मैं घर से दूर हूं तो क्या हुआ, मैं क्यों चिंतित होऊं,मां है न,पर आज जब वो आवाज़ एकाएक ख़ामोश हुई तो उस बेटे को ऐसा महसूस हुआ,मानो पैरों के निचे से ज़मीन ही हट गयी,शरीर तो खड़ा है पर उसमें जान नहीं रहा,बेज़ान सा बूत बना बेटा एकटक माँ के उस चेहरे को देखते हुए जार बेज़ार रोये जा रहा था जिस चेहरे पर इसी बेटे को देख एक चमक सी आ जाती थी,पर आज ऐसा क्या हुआ कि ना तो चेहरे पर वो चमक ही है और ना ही मां कुछ बोल ही रही है,चेहरे को देखते देखते वह शून्य में ताकने लगता है,उसकी अर्धबेहोशी तब एकाएक काफ़ूर होती है जब अस्पताल के किसी कर्मी द्वारा यह कहा जाता है कि भइया चला जाये शव श्मशान ले चलना है,चलिए कागज़ी प्रक्रिया पूरी कीजिये,बोझिल मन से बेटा उधर कागज़ी प्रक्रिया को आगे बढ़ता है तो इधर अस्पताल कर्मी शव को ले जाने की तैयारी में जुट जाते हैं,जब कुछ देर बाद बेटा वार्ड में पहुंचता है तो बाहर ही उसे एक कर्मी बताता है कि आप फ़लाने एम्बुलेंस के पास जाएं शव वहीं है,वह भागते हुए गाड़ी पास पहुंचता है,जहां उससे कहा जाता है कि जल्दी से बैठिए श्मशान चलना है,वह बैठ जाता है और गाड़ी बढ़ जाती है,कुछ ही देर में एम्बुलेंस नदी किनारे हरिश्चन्द्र घाट पहुंचता है,जहां जल्दी से शव को उतार कर ज़मीन पर रखते हुए गाड़ी लौट जाता है,एक तरफ़ मां की मौत से उसके लिए सारी दुनिया अंधकारमय हो ही गया था,अब जैसे ही उसके सामने शव के अंतिम संस्कार करने का मौक़ा आया तो उसके आंखों के सामने अंधेरा छा गया,क्योंकि जहां एक शव के अंतिम संस्कार के पहले उसे चिता तक ले जाने के लिए भी चार कांधे की ज़रूरत होती है,लेकिन विडंबना देखिये वो अकेला था,वो मां की चिता पास बैठ गया और सोचने लगा कि जब तक मां जीवित थी,परिवार में अपनों के साथ साथ दूर के रिश्तेदारों का भी ख़्याल रखा और समय समय पर उनके लिए खड़ी रही,पर आज उसे चिता तक ले जाने के लिए चार अपने भी मौजूद नहीं हैं,अभी वो यही सब सोच ही रहा था की चार चार पांच युवक उसके पास पहुंचते हैं और उससे कहते हैं कि हम इसी मुस्लिम नगर के मुसलमान युवक हैं आपकी यह विवशता हमलोगों से देखी नहीं जा रही है,अग़र आपकी इजाज़त हो तो हम सभी अंतिम संस्कार में शरीक होना चाहते हैं,इतना सुनते हीं उस बेटे के आंखों से ज़ोरों से आंशु झरने लगे,लेकिन आंशु में फ़र्क था,अब तलक का आंशु ग़म का था पर जो आंशु अब निकल रहे थे वो ख़ुशी के थे,साथ ही यह भी कहना चाहूंगा कि यह शायद पहला मौक़ा था जब श्मशान में मां की चिता के साथ बैठे बेटे की आंखों से ग़म की जगह ख़ुशी के आंशु निकल रहे थे,इसका कारण छोटा नहीं बहुत बड़ा था,और वह यह था कि जिस मां की चिता जलाने के लिए वो अब तक चिंतित था,क्योंकि उसके सारे अपने उसे इस विषम और कारुणिक पल में छोड़ गए थे वैसे हालात में ये मुसल्लम ईमान वाले मुसलमान युवक एक फ़रिश्ता बन वहां पहुंचे थे,वो सभी हाथ बटाने को ले कर आतुर थे लेकिन ज़वाब का राह ताक रहे थे,जैसे ही उस युवक द्वारा हां कहा गया वो सभी युवक आगे बढ़े और उस बेटे के साथ मिलकर शव को चिता पर ले गए और चिता पर लकड़ी रखने के साथ साथ बेटे को मुखाग्नि पकड़ाई और पूरे हिंदू संस्कारों के साथ चिता जलायी,उधर चिता जलते वक्त दूर बैठा बेटा जहां एक तरफ़ कभी जलती चिता को तो कभी उन युवकों को भी नज़र करता रहा जिनके द्वारा गंगा जमुनी तहज़ीब को आज श्मसान घाट पर जीवंत कर दिया गया।

हमने उसे हिंदू और मुसलमान बनाया:- दो क़ौम हिंदू और मुसलमान के बीच आपसी वैमनस्य पैदा कर,एक दूसरे से लड़ा कर अपनी राजनीति रोटी सेकने वाले वो धर्म के ठेकेदारों को क्या यहां शर्म नहीं आनी चाहिए..?,जिस तरह हमारे साथ साथ हर उन आंखों को जो एक समान नज़रों से दोनों क़ौमों को देखते और उन्हें सम्मान देते हैं को आज यह हिंदू की चिता और जलाने वाले मुसलमान हाथ नज़र आये,क्या उन्हें भी नज़र आये होंगें जो सीधे रूप में इन हाथों को नापाक और ख़ुद के हाथों को पाक बताते हैं,अरे कहां गए वो पाक हाथ जब एक बेटा श्मशान घाट पर बैठ मां की चिता कैसे जले इस चिंता से बेसुध होए जा रहा था,कहां गए वो पाक हाथ जो उन्हें यानी मुसलमानों को हिंदू विरोधी और अपने आप को रक्षक बताते नहीं थकते,अरे सुनो वैसे पाखंडी लोगों तुम पानी में नहीं बल्कि बालू निकाले जाने से खाली हुए मिट्टी वाली नदी में मुंह रगड़ कर मर जाओ,क्योंकि जिसे तुम नापाक हाथ कहते थे,देखो उसने किसी जनाज़े को नहीं बल्कि एक हिंदू चिता को हाथ ही नहीं लगाया बल्कि उसे कांधा दे कर उसका अंतिम संस्कार भी किया,आज से कमसे कम यह संकल्प लो कि हम धर्म के नाम पर गंदी राजनीति नहीं करेंगें,क्योंकि नहीं डिगता सबका ईमान,ग़लत नहीं होता हर मुसलमान"..साथ ही साथ एक बात को तो आज गांठ बांध लेना ज़रूरी है कि "उसने तो सबको केवल इंसान बनाया,हमने उसे हिंदू और मुसलमान बनाया।"


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