नहीं है अब डर,आइए गढ़वा जिला घूमिए हो कर निडर


आशुतोष रंजन
गढ़वा

आज गढ़वा जिला का स्थापना दिवस है,गुजरे 34 साल पूर्व यानी एक अप्रैल 1991 को पलामू से अलग हो कर गढ़वा जिला अस्तित्व में आया था,विकास से कोसो दूर होने के साथ साथ यहां के लोग दहशत के माहौल में जीवन बसर किया करते थे,क्योंकि इस नवगठित जिले पर नक्सलियों का काला साया जड़वत था,रात के अंधेरे में कौन कहे दिन के उजाले में कहीं भी आना जाना मुनासिब नहीं था,लोग जब घर से निकल कर कहीं आते जाते थे तो उनके साथ साथ घरवाले भी उनके लौटने तक किसी अनहोनी को ले कर चिंतित रहते थे,ऐसी बात नहीं की संयुक्त जिले में इससे पार पाने की कोशिश नहीं हुई,लेकिन वो सारी कोशिश नाकाफ़ी रही,प्रयास बलवती तबसे हुई जबसे गढ़वा जिला के रूप में अस्तित्व में आया,पुलिस तो प्रयास कर ही रही थी,नक्सल खात्मा के लिए जिले में सीआरपीएफ को स्थापित किया गया,जिसका आलम हुआ की दोनो के संयुक्त प्रयास से नक्सलियों पर काबू पाने का अभियान शुरू हुआ,जिसका सुपरीनाम हुआ की अनवरत सफ़लता हासिल होने लगी और आज जिले के 34 वें स्थापना दिवस के रोज़ गढ़वा पूर्ण रूप से नक्सलियों से मुक्त हो गया,आप पूछिएगा की कैसे तो आइए आपको Bindash के इस ख़ास ख़बर के ज़रिए बताते हैं।

जिला के 34 वें स्थापना दिवस रोज़ पूर्ण रूपेण नक्सल मुक्त हुआ गढ़वा : – आज यानी गढ़वा के 34 वें स्थापना दिवस के रोज़ जिला कैसे पूर्ण रूप से नक्सल मुक्त हुआ इस बावत आपको बताएं की संयुक्त पलामू में रहते हुए ही गढ़वा का हर इलाका बेहद नक्सल प्रभावित हो चुका था,पिपुलस्वार नाम से शुरू हुआ संगठन बाद में माओवादी के नाम से प्रचलित हुआ,विकास का विरोध और विध्वंस के ज़रिए प्रभावी होने वाला उक्त नक्सली संगठन आगे चल कर सिद्धांत से पूरी तरह भटकते हुए आतताई बन गया,इधर नक्सली खात्मा को ले कर शुरू हुआ अभियान भी परवाज़ लेता रहा और सफ़लता हासिल होती रही,इस बीच चारो ओर से घिर जाने के हालात में नक्सलियों द्वारा बूढ़ा पहाड़ को अपना पनाहगार बना लिया गया,यहां से भी उन्हें खदेड़ने के साथ साथ पहाड़ को उनसे आज़ाद कराने का एक अलग और बड़े अभियान का आगाज़ हुआ,और इस जानकारी से तो आप बख़ूबी वाकिफ हैं की जब अभियान अंजाम पर पहुंचा तो बूढ़ा पहाड़ नक्सलियों से आज़ाद हो गया,साथ ही यहां यह भी बता ही दूं की केवल बूढ़ा पहाड़ ही नहीं गढ़वा का हर क्षेत्र माओवादी नक्सलियों से मुक्त हो गया,इधर माओवादी नक्सलियों से गढ़वा को मुक्त करा लेने के बाद पुलिस सीआरपीएफ एवं सिविल प्रशासन राहत की सांस लेते हुए अब जहां एक ओर बूढ़ा पहाड़ एवं उससे सटे इलाकों में विकासीय इबारत लिखने में जुटी हुई तो इधर माओवादी से अलग हुआ एक और नक्सली संगठन जेजेएमपी चुनौती के रूप में सामने आ गया,लेकिन माओवादी से जिले को मुक्त करा लेने के बुलंद हौसले से लबरेज़ इनके विरुद्ध भी कार्रवाई शुरू की गई,और इसमें भी सफ़लता इस रूप में हासिल हुई की आज इस संगठन के एक मात्र बचे सदस्य की गिरफ़्तारी के बाद इस संगठन का भी जिले से समूल खात्मा कर दिया गया,तभी हमने आज ख़बर का शीर्षक दिया की जिला के 34 वें स्थापना दिवस रोज़ पूर्ण रूपेण नक्सल मुक्त हुआ गढ़वा।

तभी तो आज ऐसे हुई अंतिम नक्सली की गिरफ़्तारी: – आज की इस बड़ी सफ़लता को नज़र करते हुए एक पंक्ति तो लिखना बनता है की नक्सलियों के समूल खात्मा को ले कर पुलिस की कुछ यूं बढ़ी थी रफ्तारी,तभी तो आज ऐसे हुई अंतिम नक्सली की गिरफ़्तारी,इस गिरफ्तारी की कहानी बताने के पहले आपको मैं कुछ पहले ले चलना चाहूंगा,बताऊं की गुज़रे सत्रह दिसंबर को जिले के रंका अनुमंडल इलाके के ढेंगुरा जंगल में जेजेएमपी नक्सली संगठन टुनेश उरांव के पांच सदस्यीय दस्ते के साथ पुलिस की मुठभेड़ होती है,जिसमें तत्कालीन रंका थाना प्रभारी शंकर प्रसाद कुशवाहा गोली लगने से घायल होते हैं,उक्त मुठभेड़ के बाद इलाके में पुलिस सर्च अभियान चलाती है जिसमें उस मुठभेड़ में मुख्य रूप से शामिल नक्सली शिवपूजन मुंडा को गिरफ़्तार किया जाता है,उसके निशानदेही पर जहां एक ओर मुठभेड़ में इस्तेमाल किए गए हथियार की बरामदगी होती है वहीं उससे हुए पूछताछ में कई महत्वपूर्ण जानकारी भी हासिल होती है,जिसके आलोक में पांच रोज़ बाद हीं यानी तेईस दिसंबर को एक अन्य नक्सली सदस्य मनोज राम को गिरफ़्तार कर लिया जाता है,मुठभेड़ के बाद की जा रही कार्रवाई में गिरफ्तारी के निमित पुलिस को लगातार सफ़लता हासिल हो रही थी लेकिन पुलिस का लक्ष्य तो मुख्य आरोपी और संगठन चालन कर्ता टुनेश को गिरफ्त में लेने की थी,कार्रवाई में और तीव्रता लाई गई और वो दिन भी आ गया जब गढ़वा पुलिस द्वारा दी गई पुष्ट सूचना के आधार पर छत्तीसगढ़ पुलिस के सहयोग से तेरह मार्च को टुनेश उरांव को भी गिरफ़्तार कर लिया गया,उधर इतनी गिरफ्तारी के बाद एक अंतिम बचे सदस्य को गिरफ्त में लेने की दिशा में पुलिस द्वारा कार्रवाई में रफ्तारी लाई गई और इसी बीच एसपी दीपक पांडेय को सूचना मिली की मुठभेड़ का मुख्य आरोपी भंडरिया के मरदा गांव निवासी राहुल केशरी घटना के बाद आंध्रप्रदेश के भीमावरम में छुप कर मजदूरी कर रहा है,उक्त सूचना के आलोक में एसपी द्वारा रंका अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी रोहित रंजन सिंह के नेतृत्व में एक टीम का गठन कर आंध्रप्रदेश भेजा गया जहां स्थानीय पुलिस के सहयोग से छापेमारी कर राहुल को गिरफ़्तार कर लिया गया,गिरफ्त में लेने के बाद उसे रंका थाना लाया गया जहां हुई पूछताछ में जहां एक ओर उसके द्वारा उक्त मुठभेड़ के विषय में पूरी जानकारी दी गई तो वहीं दूसरी ओर उसने बताया की जिस इंसास रायफल से वो मुठभेड़ में गोली चला रहा था यहां से भागने के क्रम में उसके द्वारा उसे जासोबार जंगल में छुपाया गया है,उसके बताए स्थल पर पहुंच पुलिस द्वारा सीआरपीएफ 172 बटालियन के सहयोग से जहां उस हथियार को बरामद किया गया वहीं 41 राउंड गोली,एक पाउच और चार मैगजीन भी बरामद कर लिया गया,तो इस तरह गढ़वा में माओवादी के बाद फुफकारने वाले एक मात्र नक्सली संगठन के फन को कुचलने के साथ साथ जिले से नक्सलियों का समूल खात्मा कर दिया गया !

हौसले को परवाज़ देता है रिवार्ड : – किसी भी सरकारी सेवा के साथ साथ ख़ास कर पुलिस सेवा में रिवार्ड बहुत ज्यादा मायने रखता है,जहां एक ओर नौकरी में प्रोन्नति में सहायक सिद्ध होता है वहीं और बेहतर कार्य करने के हौसले को भी परवाज़ देता है,आपको बताएं की जबसे इस नक्सली संगठन के समूल खात्मे के अभियान में एसपी जुटे हुए थे और जैसे जैसे सफ़लता हासिल हो रही थी,वैसे उस सफ़लता के निमित किए जाने वाले प्रेसवार्ता में ही पुलिस अधिकारी सहित पुलिस कर्मी को रिवार्ड दे रहे थे,हम इस अंतिम और समूल खात्मा वाली सफलता की बात करें तो आज किए गए प्रेसवार्ता में भी एसपी ने बताया की इस गिरफ़्तारी में भी शामिल अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी रोहित रंजन सिंह सहित रमकंडा थाना प्रभारी सुरेंद्र सिंह कुटिया,रंका पुलिस अवर निरीक्षक प्रभात कुमार एवं आरक्षी अनिल यादव,तकनीकी शाखा सहायक नरेश मांझी,श्याम बिहारी राम एवं सीआरपीएफ 172 बटालियन के पदाधिकारी और कर्मी को भी रिवार्ड देने के साथ साथ वरीय पदाधिकारी को इनके ज़रिए हासिल किए गए सफलता से अवगत कराया जाएगा !