लगाए तो हैं आप शाम दाम दंड भेद,लेकिन कहीं प्रकट ना करना पड़ जाए खेद


आशुतोष रंजन
गढ़वा

कल लोकसभा का चुनाव अपने यहां यानी पलामू लोकसभा क्षेत्र में शांतिपूर्ण रूप से संपन्न हो गया,महीनों से अनथक मेहनत करने वाले गढ़वा जिला प्रशासन द्वारा राहत की सांस ली गई लेकिन राजनीतिक नुमाइंदों की धड़कन बढ़ गई है,लेकिन उनकी सांसे काफ़ी तेज़ हैं जो नगर परिषद के चेयरमैन बनने का ख़्वाब देखते हैं,अब आप सोच रहे होंगे की लोकसभा चुनाव के बीच चर्चा नगर परिषद की क्यों तो आइए उसे समझने के लिए इस रिपोर्ट को ज़रा पढ़ लीजिए |

तो कैसे जीतिएगा चुनाव चेयरमैन का : – पूरी बात बताने से पहले एक पंक्ति लिख रहा हूं जिससे शायद आप कुछ कुछ समझ जायेंगे,कहना यही है की “जब अपने बूथ पर भूमिका नहीं निभाइएगा वन मैन का,तो कैसे जीतिएगा चुनाव चेयरमैन का”,आप कुछ समझे,अगर आप गढ़वा से वास्ता रखने के साथ साथ यहां की राजनीति में दिलचस्पी रखते हैं तो बेशक कुछ समझ गए होंगे क्योंकि यह माजरा ही बड़ा दिलचस्प है,दरअसल अपने यहां चुनाव भले लोकसभा का हो रहा था पर इसे राजनीतिक मैदान में सेमीफाइनल मानते हुए बड़े नामवर राजनेता विधानसभा चुनाव के फाइनल मैच की तैयारी में जुटे थे तो वहीं दूसरी ओर छोटे नेता नगर परिषद की,विधानसभा वाली बात हम चार जून यानी इस चुनाव के परिणाम आने के बाद करेंगे,लेकिन नगर परिषद वाला अभी ही कर देते हैं,आपको हमने छोटे नेता के बावत बताया तो आप ऐसे समझिए हम किसी एक राजनीतिक पार्टी की बात नहीं करेंगें हम चर्चा राज्य के सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों की करेंगे,आपको बताऊं की दोनो यानी पक्ष और विपक्ष द्वारा अपने उन छोटे शहरधारी नेताओं को टास्क दिया गया था की अगर आप नगर परिषद के चेयरमैन बनने का ख़्वाब दिल में संजोए हुए हैं तो हम यही देखना चाहेंगे की पूरे शहरी क्षेत्र में नहीं बल्कि आप केवल अपने बूथ पर पार्टी को जीत दिला कर दिखाएं,फिर क्या था सभी के द्वारा इसे गंभीरता से लिया गया,जिसका अपना आधार था उसे तो अपने लोगों पर विश्वास था सो वो अपने हिसाब से सफ़ल होते दिख रहे हैं,लेकिन जो चर्चा हो रही है उसके अनुसार आपको बताएं की ख़ुद को बिना चुनाव हुए चेयरमैन मान बैठने वाले एक नेता के तो हाथ पांव अभी से ही फूलने लगे हैं जबकि चार जून आने में अभी काफ़ी वक्त बाकी है,आपको बताएं की उनकी सांसे तो उसी वक्त तेज़ हो गई थी जब उन्हें ऐसा टास्क मिला था,उन्हें तो सहसा विश्वास नहीं हुआ था की हमें भी इस अग्नि परीक्षा से गुजरने को कहा जाएगा,लेकिन सही राजनीति इसे ही कहते हैं,राजनीतिक पार्टियों को ऐसे ही परखना चाहिए,क्योंकि जो कालांतर से परिपाटी चली आ रही है उसके अनुसार पार्टी के वरीय नेता ऐसे वैसों पर दाव खेल कर मेहनत कर जाते हैं जिसे शतरंज के बिसात पर मोहरे चलने की बात कौन करे मोहरे तक को पहचानने का हुनर मालूम नहीं होता,कहने का सीधा मतलब यही है की आप नगर परिषद के चुनाव को जीत कर चेयरमैन बनने का सपना रात के अंधेरे में कौन कहे दिन के उजाले में देख रहे हैं और आप अपने एक छोटे से बूथ पर ही मात खा रहे हैं,ऐसे में तो यही कहना बनता है की या तो आप ऐसा ख़्वाब ही ना देखिए और अगर देखिए तो उसे पूरा करने का माद्दा रखिए या यूं कहें की किसी दूसरे के कंधे पर धनुष रख बिना लक्ष्य के तीर चलाने के बजाए अपनी नज़रों से निशाना साधिए,ख़ैर जिस तरह आपकी नज़र भी चार जून को आने वाले परिणाम पर टिकी है तो ठीक उसी तरह सबकी आंखें भी उसी रोज़ की राह ताक रही हैं फिर जिस तरह बिना किसी लक्ष्य के हवा में तीर |