नेता क्यों भुल जाते हैं अपनों को..?


आशुतोष रंजन
गढ़वा

राजनीति से जुड़े राजनेताओं के बारे में अक्सर लोगों का यही कहना होता है की हमलोग उन्हें अपना नेता मान कर उनके लिए एड़ी चोटी एक कर के काम करने के साथ साथ ख़ुद का वोट देने के अलावे दूसरों का भी वोट दिया करते हैं लेकिन अफ़सोस तब होता है की जब वो हमारे सहयोग और वोट से जीत कर पद पर आसीन हो जाते हैं उसके बाद हमें भूलने के साथ साथ हमसे विमुख भी हो जाते हैं,ऐसा क्यों होता है इसका सवाल दशकों से ढूंढा जा रहा है पर अब तलक वो निरुत्तर ही है,हम आज ऐसा इसलिए लिख रहे हैं क्योंकि गुजरे चुनावी दौरे के वक्त कुछ ऐसा ही वाक्या पलामू लोकसभा के गढ़वा में गुज़रा,आख़िर वो वाक्या क्या है आइए आपको बताते हैं।

लोग तो आवाक रह गए,जब नेता जी ने ऐसा पूछा : – आप तो नावाक़ीफ नहीं बेहतर वाक़िफ हैं की मात्र चार रोज़ पहले ही यानी तेरह मई को अपने यहां यानी पलामू लोकसभा में मतदान हुआ है,लेकिन इससे पहले जहां एक ओर प्रत्याशियों द्वारा मतदाताओं को अपने पाले में करने के लिए पूरा दम खम लगाया गया तो वहीं उनके समर्थकों द्वारा भी ज़ोर लगाया गया,मतदान होने के बाद अब क्या प्रत्याशी,क्या उनके समर्थक और क्या आम और ख़ास सभी की निगाहें चार जून को आने वाले परिणाम पर टिकी हुई हैं तो उधर दूसरी ओर अनवरत चौक चौराहों के साथ साथ चाय दुकान पर अहले सुबह से देर शाम तक चर्चा भी हो रही है,लेकिन इससे इतर हमें उस वाक्या से आपको वाक़िफ कराना है तो आपको बताऊं की चुनावी जनसंपर्क के दौरान एक प्रत्याशी का गढ़वा आना हुआ जहां उनके एक सशक्त समर्थक द्वारा अपने यहां नाश्ते पर आमंत्रित किया गया,नेता जी बुलावे पर पहुंचे तो जहां एक ओर उनके साथ दर्जनों लोग थे तो वहीं उक्त घर पास भी नेता जी के इंतजार में बहुत लोग मौजूद थे,नेता जी के पहुंचते ही लोगों ने उनका स्वागत किया और फ़िर अंदर बैठने पर नाश्ता शुरू होने के साथ साथ चुनावी चर्चा भी शुरू हुई,लगभग एक घंटे की मौजूदगी के बीच चर्चा के साथ साथ राजनीतिक रणनीति पर भी संजीदगी से विचार हुआ,चुनावी दौरे के बीच जहां प्रत्याशी को फुरसत नहीं होता है,क्षेत्र में उन्हें कब नाश्ता या खाना मिलेगा इसकी आस भी नहीं होती है,इस व्यस्तता के बीच नाश्ता कराए जाने से प्रभावित उक्त प्रत्याशी द्वारा सराहना भी की गई,तब तक तो सबकुछ ठीक था लेकिन जैसे ही वो वहां से जाने के लिए बाहर निकले तो अपने एक कार्यकर्ता से पूछे की हम नाश्ता तो किए लेकिन मुझे यह बताइए की आख़िर यह किनका घर है और वो कौन हैं जिनके यहां हम नाश्ता किए..?

नेता क्यों भुल जाते हैं अपनों को : – जिस तरह चुनाव के पूर्व चर्चा होती है वो चर्चा मतदान के बाद और बढ़ जाती है,उसी चर्चा के बीच में यह जानकारी हुई,सवाल तो वाजिब भी है और आए दिन ऐसा सुनने को भी मिलता है की चुनाव तक तो नेता जी हमें बहुत याद रखते हैं,जिस आत्मीयता के साथ हमसे उनका मिलना और बात करना होता है लेकिन अफ़सोस होने के साथ साथ दिल को गहरा आघात तब लगता है जब चुनाव जीतने के बाद वही नेता जी हमें भूल जाते हैं,आख़िर ऐसा क्यों होता है यह प्रश्न तो अब तलक अनुतरित है ही क्या आगे भी नाजवाब ही रहेगा..?