समाहरणालय के छत का प्लास्टर गिरा,बाल-बाल बचे कर्मी

साढ़े तीन महीने पहले ही तो हुआ है नये समाहरणालय का उदघाटन


आशुतोष रंजन
गढ़वा

एक बहुत ही प्रचलित कहावत है जिसे आम से ले कर ख़ास लोग तो वक्त वे वक्त दुहराते ही हैं लेकिन जब किसी सरकारी योजना में संवेदक की कारगुज़ारी सामने आती है तो खबरनवीस भी इस जुमले का बखूबी इस्तेमाल करते हैं,जैसा की आज हमने किया,करने का वाजिब वजह भी है,दरअसल आज गढ़वा के भव्य और आधुनिक कहे जाने वाले नए समाहरणालय भवन निर्माण की सारी सच्चाई सामने आ गई,आख़िर ऐसा क्या हुआ की उद्घाटन के महज़ साढ़े तीन माह बाद ही मुझे ऐसा लिखने पर विवश होना पड़ा तो आइए आपको इस ख़ास ख़बर से अवगत कराते हैं।

बाहर से ठाठ बाट पर अंदर से मोकामा घाट : – आप अगर गढ़वा से ताल्लुक रखते हैं तो नए समाहरणालय भवन को देख कर निश्चित रूप से हर्षित हुए होंगे,आप क्या हर कोई आह्लादित हुआ था क्योंकि स्थानीय विधायक सह राज्य के मंत्री मिथिलेश ठाकुर द्वारा एक दिली ख़्वाब के तहत इसका निर्माण कराया गया है,लेकिन इस बात से तो आप भी वाकिफ हैं की कोई भी जनप्रतिनिधि योजना की स्वीकृति कराता है ना की ख़ुद से खड़ा हो कर उसका निर्माण कराता है,उसकी सारी जिम्मेवारी संवेदक और इंजीनियरिंग विभाग की होती है,पर कालांतर से भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा हुआ गढ़वा और उसमें गोता लगाने वाले संवेदक और इंजीनियरिंग विभाग के मातहतों द्वारा योजनाओं में किस तरह खुले रूप में भ्रष्टाचार किया जाता है आज वो उस वक्त नुमाया हुआ जब अपने उदघाटन के साढ़े तीन महीने बाद ही नये समाहरणालय में अवस्थित स्थापना कार्यालय के छत के प्लास्टर का काफी हिस्सा नीचे गिर पड़ा,गनिमत यह रहा की जहां छत का प्लास्टर गिरा वहां उस वक्त कोई भी कर्मी मौजूद नहीं था, अन्यथा बड़ी घटना घटित हो सकती थी,जिस स्थापना कार्यालय के छत का प्लास्टर गिरा है वह उपायुक्त कार्यालय के बगल में पहली मंजिल पर स्थित है,आपको बताएं कि करोड़ों रूपये की लागत से हाल में ही कल्याणपुर में नया समाहरणालय बनाया गया है, जिसका उद्घाटन तीन मार्च को मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन ने किया था,जबकि लोकसभा चुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद आठ अप्रैल से इसमें कामकाज विधिवत रूप से प्रारंभ किया गया है।

खौफ़ होना तो वाजिब है : – छत के प्लास्टर के गिरने को भले हल्के में लिया जा रहा हो लेकिन सरकार के मुलाजिम होने के नाते भले कर्मी केवल भव्य दिखने वाले भवन में कल से उसी तरह नियमित काम करें लेकिन उनका ध्यान नीचे फाइलों से ज्यादा ऊपर छत की ओर ही रहेगा क्योंकि कहीं ऐसा ना हो की छत का प्लास्टर कौन कहे कहीं छत ही ना गिर पड़े,क्योंकि जब महज़ साढ़े तीन माह बाद ही ऐसा वाक्या सामने आ गया तो इस निर्माण पर सीधे रूप में संदेह करना वाजिब है।

अब भले जांच ना हो लेकिन अगर इस भवन के साथ साथ टाउन हॉल,स्टेडियम और नए बस स्टैंड में ऐसी पुनरावृति ना हो इसलिए वृहद जांच बेहद ज़रूरी है ताकि निर्माण में बरती गई घोर अनियमितता और योजना राशि के बंदरबांट की कलई खुल सके।