नहीं होनी चाहिए हर विषय में राजनीति…?


आशुतोष रंजन
गढ़वा

लाखों की आबादी को समुचित इलाज़ उपलब्ध कराने वाला जिले का एकमात्र सदर अस्पताल इलाज़ के लिए कम और विवादों के लिए ज्यादा पहचानीत होने लगा है,क्योंकि यहां अक्सर डॉक्टर और कर्मियों के साथ मरीज़ के परिजन की आपसी नोकझोंक सामने आती रहती है,ताज़ा मामला तो बेहद चर्चा का विषय बना हुआ है क्योंकि इस बार उक्त अस्पताल में परिजन नहीं बल्कि राजनीतिक नुमाइंदे जो भीड़ गए हैं,क्या है पूरा वाक्या आइए आपको इस विशेष ख़बर के ज़रिए बताते हैं।

इस कारण अखाड़ा बना है अस्पताल : – आपको बेहतर रूप से जानकारी है उसके बावजूद भी मूल विषय पर आने से पहले आपको एक बार फिर वाकिफ़ करा दें की गढ़वा सदर अस्पताल में मरीजों को बेहतर इलाजिय सुविधा मयस्सर हो इस निमित गढ़वा से निर्वाचित होने वाले सभी जनप्रतिनिधियों द्वारा वादा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई,लेकिन हालात कितने बदले यह बताने की नहीं बल्कि ख़ुद महसूस करने की ज़रूरत है,वर्तमान गुजरते वक्त में कुछ व्यवस्थाएं भले सुधरी हों लेकिन जो बड़ी समस्या है वो सालों से जड़वत ही है,जैसे डॉक्टर और कर्मियों की कमी जिसे दूर करने की दिली कोशिश आज तलक नहीं हुई,जिसका नतीज़ा है की आए दिन अस्पताल अखाड़ा बन रहा है।

बढ़िया विवादों वाला अस्पताल : – उधर डॉक्टर और कर्मियों की नाकाफ़ी वाले अस्पताल में जब मरीज़ पहुंचते हैं तो या तो उन्हें रेफर होना पड़ता है या अगर इलाज़ हुआ भी तो उस इलाज़ के लिए उन्हें घंटो मशक्कत करनी पड़ती है,इसी बीच अगर कुछ अनहोनी हो गई तो मरीज़ के परिजनों का आक्रोशित होना स्वाभाविक है,और उस आक्रोश का शिकार मौक़े पर मौजूद डॉक्टर और कर्मियों को होना पड़ता है,तभी हमने लिखा की बेहतर इलाजों वाला नहीं बल्कि बढ़िया विवादों वाला अस्पताल हो कर रह गया है।

आज तो राजनीतिक नुमाइंदे ही भीड़ गए : – अगर ऐसा लिखें तो कुछ गलत नहीं होगा की जिसके कंधों पर दी गई है व्यवस्था सुधारने की जिम्मेवारी,अब वही करने लगे मारामारी,दरअसल मुझे जानकारी आज की घटना की देनी है तो उस बावत आपको बताएं की देर रात शहर मुख्यालय से दो महिलाएं प्रसव के लिए अस्पताल लाई जाती हैं,अब यहां यानी सदर अस्पताल में व्यवस्थाएं सुधर गई हैं प्रसव की सुविधा मौजूद है इसी आस से कहीं बाहर जाने में सक्षम घर की महिलाएं यहां लाई गई थीं,लेकिन यह क्या उन्हें प्रसव कक्ष के बाहर कई घंटों तक तड़पते हालात में महिला चिकित्सक का इंतज़ार करना पड़ा,हालात बिगड़ता देख परिजनों द्वारा विधायक के स्वास्थ्य विभाग प्रतिनिधि को सूचना दी गई,इलाज़ के विषयक सूचना मिलते ही किसी भी वक्त अस्पताल पहुंचने और मरीज़ को माकूल इलाज़ उपलब्ध करवाने वाले कंचन साहू इस सूचना पर फौरन अस्पताल पहुंचे और सबसे पहले परिजन से मिल मरीज़ का मौजूदा हाल जाना,तब उनके द्वारा अस्पताल मैनेजर से डॉक्टर के बारे में जानकारी ली गई,लेकिन वाज़िब ज़वाब ना मिलता देख कंचन बिफर पड़े और कहा गया की ड्यूटी के बाद भी डॉक्टर के गायब रहने और मरीज़ के हालात बिगड़ने की जानकारी लिखित रूप में वो उपायुक्त को दें लेकिन मैनेजर द्वारा नहीं किया गया,इसी बीच दोनो ओर से बातें बढ़ीं फिर कंचन साहू द्वारा मैनेजर के साथ मारपीट की गई,इस दुर्व्यवहार की जानकारी अपने सीएस और डीएस को देने के साथ साथ डॉक्टरों और कर्मियों द्वारा डीसी को भी जानकारी से अवगत कराया गया,उधर डीसी द्वारा इस मसले को गंभीरता से लिया गया क्योंकि डॉक्टर और कर्मी काम बंद करने पर अड़े हुए थे,लेकिन डीसी द्वारा समझाने और जांच के उपरांत विधि सम्मत कार्रवाई किए जाने की बात कहे जाने पर सभी अस्पताल को लौटे।

क्या आक्रोश वाजिब नहीं है : – हर विषय में राजनीति हो,चलेगा लेकिन इस मुद्दे पर तो राजनीति कतई नहीं होनी चाहिए क्योंकि आज हमें तो कल आपको भी ज़रूरत पड़ना है,हम आप ज़रा अपने दिल पर हाथ रख कर सोचिए अगर घर में कोई बीमार पड़ता है या कोई दुर्घटना घटित होती है तो सीधे आप रांची तो जायेंगे नहीं,प्राथमिक इलाज़ के लिए हम आप सदर अस्पताल पहुंचेंगे,जहां पहुंचने पर आपको इलाज़ मिलने की जगह इंतज़ार मिलेगा,हम आप बेचैनी में डॉक्टर के चेंबर तरफ़ या तो देखेंगे या बार बार जायेंगे लेकिन डॉक्टर से मुलाकात नहीं होगी और इधर हमारे मरीज़ की हालत बिगड़ती रहेगी,हम अपआप एक बार उधर जाएंगे तब तक कोई आ कर कहेगा की मरीज़ अब नहीं रहे,और उधर से आपको डॉक्टर भी आते हुए दिखाई देंगे,ज़रा उस वक्त का अंदाज़ा लगाइए आपकी मानसिक स्थिति क्या होगी,क्या आप बिफर नहीं पड़ेंगे,क्या आपके मन मस्तिष्क में आक्रोश नहीं उपजेगा,वही आक्रोश तब कंचन साहू के मन में उपजा क्योंकि अगर कुछ देर और होती तो प्रसव पीड़ा से तड़प रही दोनो को बचा पाना मुश्किल हो जाता,इसीलिए मेरा कहना है की कभी भी निर्णय पर पहुंच जाने से पहले एक बार अपने आप को उस जगह पर खड़ा कर के सोचना चाहिए की अगर मैं ख़ुद वहां होता तो किस मानसिक स्थिति में होता।

क्या डॉक्टरों और कर्मियों से दुर्व्यवहार उचित है : – जहां तक मुझे मालूम है हो सकता है मैं गलत भी हो सकता हूं,वो यह की डॉक्टर से कभी गलत व्यवहार नहीं करना चाहिए,और ख़ास कर गढ़वा सदर अस्पताल के परिप्रेक्ष्य में बात करें तो जहां आज दशकों से डॉक्टरों और कर्मियों की कमी यथावत है,जीतने मौजूद हैं उन्हीं के द्वारा मरीजों को इलाज़ उपलब्ध कराया जा रहा है,सुविधा के नाम पर उक्त अस्पताल में इतनी कमी है जिसे गिनाने पर आया जाए तो शायद इस उम्र में गिनती भूल जाएं,लेकिन इस विषम हालात में भी जहां एक ओर डॉक्टर और कर्मी हमारे आपके इलाज़ के लिए हमेशा तत्पर रहा करते हैं,इसके अलावे यह भी कहना ज़रूरी है की वो भी कोई जापानी रोबोट नहीं बल्कि हमारे आपकी तरह हाड़ मांस के इंसान ही हैं,ऐसे में क्या हमें यह नहीं सोचना चाहिए की जिस तरह कई घंटों नहीं बल्कि कुछ देर ही एक लगातार काम करने के बाद जब हम आप थकान महसूस करने लगते हैं तो क्या एक लगातार काम करने से उन्हें थकान नहीं होती होगी,अगर होती होगी तो क्या उन्हें कुछ देर नहीं बल्कि कुछ लम्हा भी आराम करने का हक़ नहीं है,लेकिन फिर भी वो आराम को दरकिनार कर हमारे आपके नासाज़ तबियत को ठीक करते हैं,और तो और हम आप इन्हें धरती का भगवान कहते हैं,तो ऊपर वाले से मोहब्बत और नीचे वाले से नफ़रत,ऐसे में ज़रूरी है इनकी विवशता को ध्यान में रखते हुए प्रेम व्यवहार से काम लेने की ताकि कहीं ऐसा ना हो की हमारा आपका दुर्व्यवहार ज़रूरत पड़ने पर हमारे आपके लिए ही कहीं प्राणघातक ना बन जाए…?