Bindash News || मुखिया जी को नमन..
    

    
    

    
    

    
    
    






       
        
        
 


    

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मुखिया जी को नमन..

Bindash News / 01-06-2021 / 1129


जिसने किया ग़लत व्यवस्था का सर्वनाश,बस इसीलिए तो मुखिया जी को आदर्श मानते हैं अविनाश


आशुतोष रंजन
गढ़वा

बहुत लोग तस्वीर देख कर समझ गए होंगें लेकिन कुछ लोग इस वर्तमान दौर के ऐसे भी हैं जो ना तो इस तस्वीर से उन्हें पहचान पाएंगें और ना ही उनके बारे में ही उन्हें कुछ जानकारी है,तो भला वो तो इस जानकारी से नावाक़िफ़ रहेंगें ही कि युवा नेता सह समाजसेवी अविनाश दुबे उर्फ टुनटुन द्वारा आख़िर किस मुखिया जी को नमन किया गया,तो आइए अपने इस ख़बर के जरिये हम आपको वाक़िफ़ कराते हैं।

आइये जानिए कौन थे मुखिया जी:- मुखिया जी के बावत आपको बताएं कि उनका पूरा नाम ब्रह्मेश्वर सिंह था जिन्हें लोगों द्वारा एक उपनाम दिया गया था मुखिया जी,जो शुरुआत से अंतिम तक मुखिया जी ही कहाते रहे,भोजपुर ज़िले के खोपिरा गांव के रहने वाले मुखिया ऊंची जाति के ऐेसे व्यक्ति थे जिन्हें बड़े पैमाने पर निजी सेना का गठन करने वाले के रुप में जाना जाता है,90के दशक में "भूरा बाल साफ करो" वाली रणनीति के अंतर्गत नक्सलियों का आतंक फैल रहा था,जिस भी सवर्ण की जमीन पर लाल झंडा लगा दिया जाता वो जमीन नक्सलियों की हो जाती,नक्सली लगातार अपना दायरा बढ़ा रहे थे,जमीन हथियाने के साथ साथ उनलोगो द्वारा बड़े पैमाने पर नरसंहार किया गया जिसमे मारे गए लोगों में सबसे ज़्यादा संख्या स्वर्ण जातियों की रही,ऐसे दर्जनों नरसंहारों में सैंकड़ो किसानो को मार कर लाखो एकड़ भूमि बंधक बना ली गयी,कई गांवों में फसलें जलाई जा रही थीं और किसानों को शादी-ब्याह जैसे समारोह आयोजित करने में दिक्कतें आ रही थी,कहा जाता है कि संयुक्त बिहार के कई क्षेत्रों में तो खुलेआम ब्राह्मणों की चोटियां तक काटी जाने लगी,और जनेऊ पहनने वालो को अपमानित किया जाने लगा था,या यूं कहें कि पूरा बिहार उनके आतंक के जद्द में आ गया था,जो कोई कहीं मुखर होता तो उसे मार दिया जाता था,समूल बिहार जलने लगा था,हर कोई बस यही सोचने लगा कि काश कोई ऐसा मसीहा आता जो हमें इस आतंक के जद्द से बाहर निकालता,उसी दौर में ब्रह्मेश्वर सिंह आगे आये और नक्सलियों के फन कुचलने का संकल्प लिया,उन्होंने साथ आने का एक आह्वान क्या किया,लोगों की एक बड़ी संख्या उनसे जुड़ने लगी,वो आगे बढ़ते गए और कारवां जुटता चला गया,फिर उनके द्वारा सुझाये गए नाम के साथ एक सेना का गठन हुआ जिसे रणवीर सेना नाम दिया गया,लोग बताते हैं कि जिस रोज़ सेना का नामकरण हुआ उसी रोज़ ब्रह्मेश्वर सिंह को भी लोगों ने उपनाम दिया,यानी उसी दिन से वो मुखिया जी कहलाने लगे,संगठन का मक़सद था नक्सलियों के आतंक से बचने के लिए प्रतिरक्षा,जो शुरू हुई,नब्बे के दशक में रणवीर सेना द्वारा नक्सली संगठनों के ख़िलाफ़ कई बड़ी कार्रवाई की गई,जिसमें पहला और प्रमुख नाम आता है लक्ष्मणपुर बाथे कांड का,जो एक दिसंबर 1997 को हुआ था,जिसमें 58 नक्सली समर्थक मारे गए,एकाएक हुए इस हमले से नक्सलियों को एक बड़ा झटका लगा,जिसका बदला नक्सली संगठनों द्वारा बाड़ा में नरसंहार कर लिया गया,
अविनाश बताते हैं कि इस घटना ने राष्ट्रीय स्तर पर बिहार की जातिगत समस्या को उजागर कर दिया,बिहार में
उस समय इस संगठन को भूमिहार किसानों की निजी सेना कहा जाता था,इस सेना की खूनी भिड़ंत अक्सर नक्सली संगठनों से हुआ करती थी,बाद में खून खराबा इतना बढ़ा कि राज्य सरकार ने इसे प्रतिबंधित कर दिया था,नब्बे के दशक में रणवीर सेना और नक्सली संगठनों ने एक दूसरे के ख़िलाफ़ बड़ी कार्रवाईयां भी की,इसके अलावा मुखिया जी बथानी टोला नरसंहार में अभियुक्त थे जिसमें उन्हें 29 अगस्त 2002 को पटना के एक्सीबिजन रोड से गिरफ़्तार किया गया,उन पर पांच लाख का ईनाम रखा गया था,जेल में वो नौ साल तक रहे,बथानी टोला मामले में सुनवाई के दौरान पुलिस द्वारा कहा गया कि मुखिया फरार हैं,जबकि मुखिया जी उस समय जेल में थे,इस मामले में मुखिया जी को फरार घोषित किए जाने के कारण सज़ा नहीं हुई और वो आठ जुलाई 2011 को रिहा हो गए,बाद में बथानी टोला मामले में उन्हें हाई कोर्ट से जमानत मिल गयी,277 लोगों की हत्या से संबंधित 22 अलग अलग आपराधिक मामलों (नरसंहार) में इन्हें मुख्य अभियुक्त माना जाता था,इनमें से 16 मामलों में उन्हें साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया गया था।

वो हमारे आदर्श,उनका विचार हममें समाहित:- मुखिया जी जब अपने पैतृक घर रहने लगे तो उनकी सुबह की शुरुआत अपने घर के सामने गलियों में टहलने से होती थी,लेकिन एक रोज़ ऐसा भी आया जब मुखिया जी गली में टहलने तो सकुशल गए कुछ देर टहले भी लेकिन वापस को सकुशल नहीं बल्कि उनका शव आया क्योंकि एक जून 2012 की सुबह उसी गली में टहलने के दरम्यान अहले सुबह साढ़े चार बजे उन्हें गोली मार दी गयी,और एक ग़लत अध्याय को समाप्त करने वाले कि ख़ुद के जीवन का अंत हो गया,लेकिन युवा नेता अविनाश कहते हैं कि अंत उनके शरीर का हुआ है उनके विचारों का नहीं,हम शुरू से मुखिया जी को अपना आदर्श मानते हैं और जीवनपर्यंत वो जहां एक तरफ़ हमारे आदर्श रहेंगें वहीं दूसरी ओर उनका विचार हमारे अंतःकरण में समाहित रहेगा,एक बार फ़िर से मुखिया जो करबद्ध नमन।

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