Bindash News || क्या वो ग़रीब होने का ख़ामियाजा भुगत रहे हैं.?
    

    
    

    
    

    
    
    






       
        
        
 


    

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क्या वो ग़रीब होने का ख़ामियाजा भुगत रहे हैं.?

Bindash News / 04-07-2021 / 668


आख़िर कौन सुनेगा उनकी फ़रियाद.?


आशुतोष रंजन
गढ़वा

क्या वो ग़रीब हैं ये उनकी ग़लती है या सरकारी व्यवस्था में काम करने की वो ख़ामियाजा भुगत रहे हैं,हम बात यहां गढ़वा के उन कर्मचारियों की कर रहे हैं जो सालों से शोषण का शिकार हो रहे हैं,आख़िर कैसे,क्या है पूरा मामला,जानने के लिए आप Bindash न्यूज़ के इस ख़ास रिपोर्ट को पढ़िये।

एक बड़ी पुरानी पंक्ति याद आ रही है कि मज़दूरों की उसकी मज़दूरी उसका पसीना सूखने से पहले मिल जानी चाहिए,लेकिन यहां पसीना कौन कहे उनके तो खून सूखने को आये लेकिन वो अब तलक मज़दूरी से महरूम हैं,दरअसल मामला गढ़वा सर्किट हाउस यानी हिंदी में कहें तो परिसदन से जुड़ा है,जहां पर कार्यरत कर्मियों को एक तरफ़ जहां महीनों से एक पाई नहीं मिला है तो वहीं दूसरी ओर उनसे सालों पहले रांची स्थित कुबेर एनजीओ द्वारा यह कहते हुए कार्य शुरू कराया गया कि उन्हें प्रतिमाह सत्रह हज़ार रुपया दिया जाएगा,ग़रीबी के आलम में उनके द्वारा भी सोचा गया कि बाहर सुदूर प्रदेशों में मज़दूरी करने जाने से बेहतर है की घर में ही काम मिल रहा है,लेकिन उनकी सोच धरि की धरि और सारी ख़ुशी क्षणभंगुर साबित हुई,क्योंकि वो काम तो पूरी तन्मयता के साथ कर रहे हैं लेकिन उनके साथ छल करते हुए सत्रह हज़ार की जगह मात्र उन्हें छह हज़ार रुपया ही दिया जा रहा है,बाक़ी पैसा मुझे क्यों नहीं मिल रहा है उनके द्वारा जब पूछा जाता है तो उन्हें मात्र दो टूक ज़वाब मिल जाता है कि इतना ही मिलेगा।

 

एक तरफ़ जिला स्तर से ले कर राज्य स्तर तक के अधिकारी तो दूसरी ओर राज्य से ले कर केंद्रीय नेताओं के आवभगत और उनके परिसदन में रुकने तक सारी व्यवस्था मुस्तैद रखने के साथ साथ आप सुव्यवस्थित हरा भरा गार्डेन देख रहे होंगें,यहां आनेवाले हर शख़्श को यह गार्डेन अपनी ओर आकर्षित करता है और लोग तस्वीर खिंचाने के साथ साथ सेल्फ़ी लेना नहीं भूलते,पर इसे उस लायक बनाने वाले कि ज़िंदगी कितनी हरी भरी है या उन तक पहुंचने से पहले ही पानी कहीं ठहर गया है इसका अहसास ना तो आम और ख़ास को है और ना ही सरकार और सरकारी बाबू को,सारी हरियाली भी उन्हीं के भरोसे है जो दो पाई से भी वंचित हैं,वो कहते हैं कि हम सबको देखने वाले हैं लेकिन हमें देखने वाला कोई नहीं है।

उम्र के चौथेपन में भी दो निवाले के लिए काम करने वाली महिला मजदूर मालती कहती हैं कि हमलोगों के लिए ऊपर से पैसा चलता तो है लेकिन न जाने कहां रुक जाता है।

सालों से फ़रियाद कर थक चुके इन कर्मियों के शरीर में वो जान नहीं बची जिससे वो कहीं आगे जा कर गुहार लगा सकें,उनकी अंतिम उम्मीद अब हमसे बंधी है,तो हम भी वादा करते हैं कि उनकी आवाज़ बनेंगे और उन्हें उनका हक़ दिला कर रहेंगें।

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