Bindash News || सबके घरों में होगी "रौशनी",खुद की झोपड़ी रहेगी "अन्हार"
    

    
    

    
    

    
    
    






       
        
        
 


    

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सबके घरों में होगी "रौशनी",खुद की झोपड़ी रहेगी "अन्हार"

Bindash News / 05-11-2018 / 1211


ज़बान से नहीं ज़मीर से स्वीकारिये साहेब,भूखे पेट का सवाल है..?

 
आशुतोष रंजन
 
गढ़वा
 
सबके घरों को करते हैं हम रौशन,पर रहती है खुद की झोपड़ी अन्हार",जी हां कुछ इसी पंक्ति के साथ अपने दर्द को बयां करते हैं कुम्हार,दीपावली में मिटटी के दिए से दूसरों  के घरो को रौशन करने वाले कुम्हारों के खुद का जीवन आज अँधेरे में है,प्रकाश का पर्व दीपावली में दिया बनाने वाले कुम्हार आज महंगाई और आर्थिक तंगी के कारण मुफलिशी की जिंदगी गुजारने को विवश हैं।
ज़िंदगी है थमा हुआ:- चल रही है चाक,पर ज़िंदगी है थमा हुआ,जी हां वर्तमान गुजरते वक्त में कुम्हारों का चाक तो चल रहा है पर उनके जीवन का पहिया थमा हुआ है,तस्वीर के जरिये आप खुद देखिये की तेज गति से चलते चाक पर  मिटटी रख अपने हुनर से उस मिटटी को आकार दे कर दिया का रूप गढ़ने वाले ये हैं गढ़वा के कुम्हार,जिनका जीवन आज दोराहे पर आ खडा हुआ है,इनके मन में है की इस बार दीपवाली में उनके  दिया की बिक्री ज्यादा हो ताकि अपने परिवार का भरण पोषण ठीक से हो सके,पर हर साल इनकी यह सोच धरी की धरी रह जाती है,ज्यादा आमदनी कौन कहे इन्हें कौड़ी के तिन हो जाना पड़ता है,यानी ना तो मेहनत का इनाम मिल पाता है,और ना ही लागत का मुनाफ़ा। 
 
पर जलता है जिया:- अब कहां दिया जलता है साहेब,हम बनाते तो हैं दिया,पर अपना जलता है जिया,इस करुण कसक के साथ कुम्हार कहते हैं कि वे पुश्तो से इस काम को करते आ रहे हैं,लेकिन समय के साथ साथ दिया पर भी प्रभाव पड़ा है,इस आधुनिक युग में लोग दिए को भूलने लगे हैं,आज मिटटी के इस दिए की जगह मोमबती और बिजली बत्तियों ने ले लिया है,आज उनके बनाये दिय की बिक्री बहुत कम होती है जिस कारण वे आर्थिक तंगी और मुफ्लिशी की जिंदगी गुजार रहे है,कोई और दुसरा काम नहीं होने के कारण मज़बूरी में उन्हें इसे ढोना पड़ रहा है,आज मिट्टी तक खरीदना पड़ रहा है,यंहा तक की गढ़वा में पानी की समस्या के कारण उन्हें पानी की भी ख़रीदगी करनी पड़ती है,दीपावली में दीये बनाने में इस्तेमाल होने वाली मिट्टी अब कई गुना महंगी हो गयी है,साथ ही दीयों को सजाने के लिए लगाया जाने वाला रंग रोगन भी काफी महंगा हो चुका है,जिससे लागत का दाम नहीं बस अपना दम निकल जाता है हुजूर।
ज़मीर से स्वीकारिये साहेब:- ज़बान से स्वीकार,जबकि जमीर से इनकार,कहने का मतलब की दीपावली आते ही कई सामाजिक संगठन के साथ साथ दिखावे की राजनीति करने वाले राजनेता कुम्हारों की स्थिति पर दया दिखाने लगते हैं,यहां तक कि वो विदेशी लाइट की मुख़ालफ़त और मिट्टी के दिये कि वक़ालत करते हैं,लेकिन दीपावली के दिन कभी उनके घरों को देखेंगें तो आपको उनका ज़बानी चेहरा नुमाया हो जाएगा क्योंकि उन विदेशी रौशनियों से उनकी अट्टालिकाएं ही आपको दूर से रौशनी में नहायी हुई नज़र आएंगीं,इसलिए एक बार फिर कहना पड़ रहा है कि ज़बान से नहीं ज़मीर से स्वीकारिये साहेब किसी के भूखे पेट का सवाल है।
 
आने वाले दीपावली में लोग अपने अपने घरों को रौशन करेंगें,पर ये कुम्हार उस रौशनी में भी अपने जीवन को अँधेरे में ही पाएंगे,क्योंकि उनके दिये की लौ को कृत्रिम रौशनियों ने कम कर दिया है,अफ्शोश की ये हुक्मरानों के नजर से भी ओझल हैं।
 
 

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