41 वर्षों की अद्वितीय सेवा के बाद झारखंड के पहले गैलेंट्री अवॉर्डी वायु योद्धा सुनील कुमार सिंह सेवानिवृत्त
गढ़वा जिलांतर्गत कांडी के हरिहरपुर निवासी जन्म भूमि की एक विभूति की शौर्यगाथा
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दिवंगत आशुतोष रंजन
प्रियरंजन सिन्हा
बिंदास न्यूज, गढ़वा
गढ़वा : झारखंड के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो केवल अपने समय के नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा बन जाते हैं। भारतीय वायुसेना के गैलेंट्री अवॉर्ड से सम्मानित जांबाज़ अधिकारी सुनील कुमार सिंह ऐसे ही एक विलक्षण व्यक्तित्व हैं। झारखंड के गठन के बाद वे राज्य के पहले गैलेंट्री अवॉर्डी वायुसेना अधिकारी बने और अब 41 वर्षों की गौरवपूर्ण, साहसिक एवं निःस्वार्थ राष्ट्रसेवा के बाद सेवानिवृत्त होकर एक स्वर्णिम अध्याय पूर्ण कर चुके हैं।
सुनील कुमार सिंह का जीवन केवल एक सैन्य करियर नहीं, बल्कि साहस, अनुशासन, कर्तव्य और मानवता की जीवंत मिसाल है। उन्होंने चार दशकों से अधिक समय तक देश की सीमाओं की रक्षा ही नहीं की, बल्कि संकट की हर घड़ी में देशवासियों के लिए देवदूत बनकर आकाश से सहायता पहुँचाई।
युद्धभूमि में अदम्य शौर्य: देश के निर्णायक क्षणों में वे सदैव अग्रिम पंक्ति में रहे। कारगिल विजय जैसे ऐतिहासिक अभियान में उनकी भूमिका ने यह सिद्ध किया कि कठिनतम परिस्थितियों में भी भारतीय वायुसेना का साहस अडिग रहता है। ऊँचे पर्वतों, सीमित दृश्यता और शत्रु की चुनौती के बीच उन्होंने सैनिकों तक रसद पहुँचाने, घायलों को सुरक्षित निकालने और रणनीतिक अभियानों को सफल बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
ऑपरेशन ब्रासटैक जैसे बड़े सैन्य अभ्यासों में उनकी भागीदारी उनकी तकनीकी दक्षता, नेतृत्व क्षमता और अनुकरणीय अनुशासन का प्रमाण रही।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का गौरव: संयुक्त राष्ट्र मिशन के तहत सूडान में सेवा देते हुए उन्होंने वैश्विक स्तर पर भारत की शांति-प्रिय, जिम्मेदार और मानवीय छवि को सुदृढ़ किया। संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में सीमित संसाधनों और अत्यधिक जोखिम के बीच उनकी सेवाएँ अंतरराष्ट्रीय सराहना का विषय बनीं।
आपदाओं में जीवनरक्षक भूमिका: जहाँ युद्ध में वे योद्धा थे, वहीं आपदाओं में वे मानवता के प्रहरी बने। सुनामी, अरुणाचल प्रदेश एवं श्रीनगर की बाढ़, तमिलनाडु और गुजरात में राहत अभियानों के दौरान उन्होंने अनगिनत लोगों की जान बचाई। सियाचिन ग्लेशियर जैसे विश्व के सबसे दुर्गम और खतरनाक क्षेत्रों में फँसे जवानों और नागरिकों को सुरक्षित निकालना उनके साहस और संवेदनशीलता का अद्भुत उदाहरण है।
वायुसेना में ऐतिहासिक उपलब्धियाँ: सुनील कुमार सिंह भारतीय वायुसेना के एक्सामिनर रहे, जहाँ उन्होंने उड़ान सुरक्षा और प्रशिक्षण मानकों को नई ऊँचाइयाँ दीं। वे पहले MI-17 V5 हेलीकॉप्टर के फ्लाइट गनर लीडर रहे—जो अपने आप में ऐतिहासिक उपलब्धि है। उनके नाम 5,500 घंटे की उड़ान दर्ज है—यह संख्या नहीं, बल्कि आकाश में समर्पण से जिया गया जीवन है।
राष्ट्र के सर्वोच्च पदों के साथ उड़ान: प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति तथा विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्षों और राज्य प्रमुखों के साथ उड़ान भरते हुए उन्होंने देश का प्रतिनिधित्व किया। यह जिम्मेदारी केवल कौशल नहीं, बल्कि सर्वोच्च विश्वास का प्रतीक होती है—जिसे उन्होंने गरिमा के साथ निभाया।
राष्ट्रीय गौरव के क्षण: 8 अक्टूबर (वायुसेना दिवस) और 26 जनवरी (गणतंत्र दिवस) के अवसर पर कई बार राष्ट्रीय ध्वज के साथ फ्लाइंग पास्ट में शामिल होकर उन्होंने आकाश में देशभक्ति की भावना को सजीव किया।
मानवीय संवेदनशीलता की मिसाल: पाकिस्तान से सरबजीत सिंह के पार्थिव शरीर को सम्मानपूर्वक भारत लाने के मिशन में उनकी प्रमुख भूमिका ने यह सिद्ध किया कि उनके लिए राष्ट्रसेवा केवल कर्तव्य नहीं, बल्कि भावनात्मक उत्तरदायित्व भी है। इसके अतिरिक्त, श्रीलंका मिशन सहित कई संवेदनशील अभियानों में उनकी सहभागिता उल्लेखनीय रही।
कैबिनेट सचिवालय में सेवा: उन्होंने कैबिनेट सचिवालय में 10 वर्षों तक सेवा देकर राष्ट्र की आंतरिक सुरक्षा और प्रशासनिक तंत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया—जहाँ अनुशासन, गोपनीयता और राष्ट्रहित सर्वोपरि होते हैं।
इस शौर्य के पीछे एक मौन शक्ति: इतनी लंबी, जोखिमपूर्ण और चुनौतीपूर्ण सेवा-यात्रा केवल एक व्यक्ति की नहीं होती। इसके पीछे एक अडिग, निःस्वार्थ और त्यागमयी शक्ति खड़ी रहती है—और वह हैं उनकी धर्मपत्नी मीना सिंह।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि मीना सिंह के आत्मबल, धैर्य और निःस्वार्थ समर्थन के बिना सुनील कुमार सिंह इन अभियानों में पूर्ण मनोबल के साथ भाग नहीं ले पाते। हर ऑपरेशन के पीछे उनकी पत्नी का मौन त्याग, परिवार की जिम्मेदारी का एकाकी वहन और देश को सर्वोपरि रखने की भावना छिपी रही। उन्होंने सिद्ध किया कि हर वीर सैनिक के पीछे उसकी पत्नी का भी उतना ही बड़ा बलिदान होता है, जो परिवार से अधिक देश को प्राथमिकता देती है।
मूल्यों से समृद्ध परिवार: मीना सिंह ने बच्चों का पालन-पोषण ऐसे संस्कारों के साथ किया, जो आज समाज के लिए प्रेरणा हैं। उनके सुपुत्र एडवोकेट अभिषेक रंजन सिंह, सुप्रीम कोर्ट एवं दिल्ली हाईकोर्ट में अधिवक्ता हैं। उनकी पुत्रवधू एडवोकेट आकांक्षा सिंह भी सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता हैं। उनकी पुत्री डॉ. अनामिका सिंह एक डॉक्टरेट धारक शिक्षाविद् हैं और आईपी यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं। यह परिवार इस बात का प्रमाण है कि राष्ट्रसेवा केवल सीमा पर नहीं, बल्कि शिक्षा, न्याय और ज्ञान के क्षेत्र में भी होती है।
एक अमर विरासत: आज, जब सुनील कुमार सिंह वर्दी को औपचारिक विदाई दे रहे हैं, तब वे केवल एक सेवानिवृत्त अधिकारी नहीं, बल्कि झारखंड और देश के लिए एक प्रेरक विरासत बन चुके हैं। उनका जीवन सिखाता है कि साहस, अनुशासन और पारिवारिक मूल्यों के साथ देशसेवा कैसे की जाती है।
गगन से उतरकर भी उनकी उड़ान समाप्त नहीं हुई है—
वह अब युवाओं के सपनों, सैनिकों के संकल्प और राष्ट्र के आत्मसम्मान में जारी रहेगी।








