मझिआंव नप व डंडा प्रखंड को अनावश्यक बताते हुए इन्हें निरस्त करने की अनुशंसा की प्रशासन ने
बीते विधानसभा सत्र में विधायक नरेश प्रसाद सिंह ने भी मझिआंव नप को निरस्त करने की मांग की है
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दिवंगत आशुतोष रंजन
प्रियरंजन सिन्हा
बिंदास न्यूज, गढ़वा
गढ़वा : जिले की प्रशासनिक सीनेरियो पर गौर करें तो मझिआंव नगर पंचायत का यह आखिरी चुनाव हो सकता है। इसके साथ ही अपना अस्तित्व खो देने के बाद डंडा प्रखंड भी पूर्व की तरह गढ़वा प्रखंड का हिस्सा हो जाएगा। क्योंकि गढ़वा जिले की प्रशासनिक संरचना में जल्द ही बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। जिला प्रशासन ने डंडा प्रखंड-सह-अंचल और मझिआंव नगर पंचायत की मान्यता समाप्त करने की अनुशंसा राज्य सरकार को भेज दी है। प्रशासनिक रिपोर्ट में इन दोनों इकाइयों को प्रशासनिक और वित्तीय रूप से अव्यावहारिक बताया गया है।
प्रशासनिक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 16 वर्ष पहले 2009 में गठित डंडा प्रखंड सरकार द्वारा निर्धारित मापदंडों को पूरा नहीं करता। ग्रामीण विकास विभाग के वर्ष 2015 के संकल्प के अनुसार किसी भी नए प्रखंड के गठन के लिए न्यूनतम 1.25 लाख की आबादी और कम से कम 15 पंचायतों का होना अनिवार्य है। जबकि डंडा प्रखंड की कुल आबादी मात्र 25 हजार है। और इसमें केवल तीन पंचायत – डंडा, भिखही व छपरदगा मात्र शामिल हैं। यह भी उल्लेख है कि डंडा प्रखंड की दूरी जिला मुख्यालय से केवल 20 किलोमीटर है और सड़क संपर्क भी बेहतर है। ऐसे में इसके अलग प्रशासनिक अस्तित्व को सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ है।
इसी तरह मझिआंव नगर पंचायत का 15 वर्ष पहले 2010 में गठन किया गया था। इसे लेकर भी प्रशासन ने गंभीर आपत्ति जताई है। रिपोर्ट के अनुसार नगर पंचायत क्षेत्र का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा आज भी जंगली व ग्रामीण स्वरूप में है। यहां कृषि भूमि, जंगल और पहाड़ी इलाके मौजूद हैं और अधिकांश आबादी खेती एवं मजदूरी पर निर्भर है। तिस पर आलम यह है कि नगर पंचायत होने के कारण यहां जॉब कार्ड का प्रावधान समाप्त हो गया। मनरेगा योजना कार्यान्वित नहीं हो रही। इसी तरह सांसद एवं विधायक गांव एवं ग्रामीणों की लाभ की योजनाओं का अपने विकास निधि से कार्यान्वयन नहीं कर पा रहे। लाभ तो नहीं मिल रहा लेकिन जो आबादी अभी तक ठीक से गांव का स्वरूप भी धारण नहीं कर सकी है उसे शहर का भारी भरकम खर्च वहन करना पड़ रहा है। होल्डिंग टैक्स से लेकर जल कर आदि देना पड़ रहा है। गांवों में जहां बिजली का बिल कम आता है वहां इन गांवों में शहरों की तर्ज पर बिजली का भारी भरकम बिल भुगतान करने की गंभीर लाचारी हो गई है। क्योंकि मझिआंव को शहर नाम देकर व्यक्तिगत लाभ लेने के लिए यह कुचक्र रचा गया था। इसमें मारे गए दर्जनों गांव के ग्रामीण। इन्हीं गंभीर कारणों को लेकर स्थानीय विधायक नरेश प्रसाद सिंह ने बीते विधानसभा सत्र में इन कमियों को उजागर करते हुए मझिआंव नगर पंचायत को निरस्त कर इसे पुन: ग्राम पंचायत में शामिल करने की मांग की है। इधर शहरीकरण और नगर पंचायत नियमों को लेकर ग्रामीणों का लगातार विरोध सामने आता रहा है। स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी कि विधानसभा चुनाव 2024 में ग्रामीणों ने मतदान बहिष्कार का निर्णय ले लिया था। जिसे बाद में प्रशासनिक आश्वासन के बाद वापस लिया गया।
जिला प्रशासन का मानना है कि डंडा अंचल और मझिआंव नगर पंचायत को समाप्त करना लोकहित और क्षेत्र के समग्र विकास के लिए आवश्यक है। इन निकायों के संचालन में हो रहे अतिरिक्त खर्च और प्रशासनिक जटिलताओं को देखते हुए इनके निरस्तीकरण को उचित बताया गया है। प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार यह अनुशंसा जुलाई 2025 में ही सरकार को भेजी जा चुकी है। इस अति आवश्यक प्रशासनिक अनुशंसा एवं क्षेत्रीय विधायक की मांग पर सरकार ने कार्रवाई की तो मझिआंव नगर पंचायत का यह चुनाव आखिरी चुनाव होगा इस पूरे मामले पर उपायुक्त दिनेश कुमार यादव ने कहा कि डंडा प्रखंड और मझिआंव नगर पंचायत को लेकर पूर्व में ही प्रशासनिक स्तर से अनुशंसा भेजी जा चुकी है। अब सरकार के निर्णय के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।








