रांची के डॉक्टर सुबह शाम की सूई लिखें तो उसे दिलाने 10 – 20 किमी कांडी मझिआंव जाना होगा
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सदास्मृत आशुतोष रंजन
प्रियरंजन सिन्हा
बिंदास न्यूज, गढ़वा
गढ़वा : गढ़वा जिलांतर्गत कांडी प्रखंड क्षेत्र के लिए मीडिया का इजाद किया हुआ शब्द झोलाछाप तर्क संगत नहीं है। क्योंकि अगर स्वास्थ्य व्यवस्था की बात करें तो यही कथित झोलाछाप चिकित्सक ही इस प्रखंड क्षेत्र के स्वास्थ्य व्यवस्था की पहचान या रीढ़ हैं। क्योंकि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था का लब्बोलुवाब यह है कि 99 वर्ष पुराने समय-समय पर विभिन्न नाम से पुकारे जाने वाले कांडी अस्पताल के लिए अभी तक अनिवार्य पदों का सृजन तक नहीं हो सका है। यह उस अस्पताल की बात है जो पूरे प्रखंड क्षेत्र की लगभग डेढ़ लाख की आबादी के लिए इकलौता अस्पताल है। जिसकी स्थापना अंग्रेजी शासन काल में जिला बोर्ड के राजकीय औषधालय के रूप में वर्ष 1927 में हुई थी। काल क्रम से यह सरकारी फाइलों में अपग्रेड होता रहा। यह राजकीय औषधालय से स्वास्थ्य उपकेंद्र, अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और अब सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में अपग्रेड हो चुका है। लेकिन इस अस्पताल के लिए जरूरी जेंट्स डॉक्टर, लेडी डॉक्टर व स्वास्थ्य कर्मी आदि के पदों का सृजन अभी तक नहीं हो सका है। इस विषय में वर्तमान विधायक नरेश प्रसाद सिंह ने विधानसभा में भी मांग की है। यह उस अस्पताल की बात है जो वर्ष 2014 से 2019 तक सूबे के वजीरे सेहत के चुनाव क्षेत्र का अस्पताल रहा है। यहीं पर 6 वर्षीय छोटी बच्ची की सुई लगाने के दौरान मौत हुई है। यह मामला अभी सुर्खियों में है। जिसको लेकर मुकदमा भी दर्ज हो चुका है। जिसकी जांच चल रही है। प्रखंड क्षेत्र के अन्य स्वास्थ्य उप केंद्रों व अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की बात करें तो 75% केंद्रों में ताला लटक रहा है। यहां प्रसंग वश यह सोचने की बात है कि आखिर सरकारी नामधारी व्यवस्था होते हुए भी कौन सी मजबूरी है कि यहां के लोग कथित झोलाछाप चिकित्सकों के पास जाने के लिए मजबूर हैं। इसलिए की सरकारी अस्पताल की तरफ रुख करने वाले 75- 80 परसेंट मरीजों को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मझिआंव रेफर कर दिया जाता है। वह अपने सामर्थ्य के अनुसार कांडी में इलाज कराने आता है। यदि उसे मझिआंव गढ़वा जाना रहता तो वह स्वयं भी जा सकता था। दूसरी बात जब वह लगातार सरकारी अस्पताल का रुख करने लगे और वहां किसी से मुलाकात नहीं हो तो निजी चिकित्सक के पास जाने पर भी उसे कोरा सा जवाब मिलता है। वैसी स्थिति में वह कहां जा सकता है। कोरोना संकट के समय सरकारी अस्पताल प्राय: बंद पड़ा था। यही निजी चिकित्सक जान पर खेल कर सभी मरीजों की जांच और इलाज कर रहे थे। यही बात वे दोहराया करते हैं। इतना ही नहीं यही कांडी अस्पताल है जहां कई बार भीषण दुर्घटनाग्रस्त मरीज के आने पर निजी चिकित्सकों ने अस्पताल में आकर घायल मरीज का इलाज किया है और प्राइवेट दुकानों से दवा दी गई है। सबसे बड़ी बात कि जब प्रशासन को मालूम है कि कांडी की हर गली में दो चार पांच निजी चिकित्सकों का क्लीनिक है तो आपकी जानकारी में ऐसे क्लिनिक चल क्यों रहे हैं। यहां तो लोग यह भी कहते सुने जाते हैं कि अस्पताल की मिली भगत से ही प्रखंड मुख्यालय में इतनी बड़ी संख्या में निजी क्लीनिक फल फूल रहे हैं। दूसरी घटना प्रखंड क्षेत्र के अधौरा गांव में हुई है। जहां एक नवविवाहिता की मौत सूई लगाने के समय तबीयत खराब हो जाने के बाद हो गई। इस गांव की बात करें तो यहां वर्ष 1988 में ही स्वास्थ्य उपकेंद्र का तत्कालीन प्रखंड चिकित्सा पदाधिकारी मझिआंव डॉक्टर महेंद्र सिंह ने फीता काटकर उद्घाटन किया था। आज की स्थिति यह है कि यहां स्वास्थ्य केंद्र सह प्रसव केंद्र का एक बड़ा भवन व स्वास्थ्य उपकेंद्र का एक छोटा भवन – यानी दो-दो भवन बने हुए हैं। लेकिन वर्तमान स्थिति है कि इन भवनों के पास पहुंचने पर बंद तालों के दर्शन होते हैं। सप्ताह में एक-दो दिन यहां पर पोस्टेड एमपीडब्ल्यू राजीव रंजन के दर्शन हो सकते हैं। लेकिन किस दिन यहां के लोगों को मालूम नहीं है। और मझिआंव सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की एएनएम कंचन कुमारी गुरुवार और शनिवार को एक-दो घंटे के लिए मात्र टीकाकरण के लिए आया करती है। यदि यहां एक अदद एएनएम भी उपलब्ध होती तो उससे सुई लगवाया जा सकता था। फर्ज कीजिए यदि मरीज गढ़वा, मेदिनी नगर या रांची से इलाज करके आया है। उसकी पर्ची में सूई लिखी गई है। जिसे सुबह शाम लगवाना है। ऐसी स्थिति में वह मरीज सुई लगवाने 10 किलोमीटर कांडी जाए कि 20 किलोमीटर मझिआंव जाए। इस हाल में उसे गांव में उपलब्ध झोलाछाप का ही शरण लेना पड़ता है। यह स्थिति बार-बार मीडिया की सुर्खियां बनती रही है। जबकि प्रखंड चिकित्सा पदाधिकारी एवं जिला के मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी से बार-बार मौखिक एवं लिखित अनुरोध किया गया है कि कम से कम हेल्थ सब सेंटर को चालू रहने दें। लेकिन इस पर कभी कोई सुनवाई नहीं होती। अगर डॉक्टर की बात करें तो उनके तो कभी चरण ही हेल्थ सेंटर में नहीं पड़ते। इस प्रखंड में हेल्थ सेंटर के बड़े-बड़े भवन में बड़े-बड़े ताले लगे हुए हैं। खुद सतबहिनी झरना तीर्थ में करोड़ों रुपए का भवन बनाकर स्वास्थ्य विभाग को हैंड ओवर किया जा चुका है। लेकिन आज तक उसका ताला नहीं खुला। जबकि सतबहिनी हेल्थ सेंटर के नाम पर लगभग 2 साल से डॉक्टर राजू कुमार दास कांडी एवं मझिआंव में ड्यूटी कर रहे हैं। मझिआंव की बात करें तो वहां सामान्य प्रशासन एवं स्वास्थ्य प्रशासन के बड़े पदाधिकारी उपस्थित हैं। बावजूद इसके आखिर वहां किस प्रकार झोलाछाप का धंधा फल फूल रहा है। इस लाख टके के सवाल का जवाब कोई नहीं देता।







