मजदूर दिवस पर सदास्मृत आशुतोष की कलम से

मजदूर दिवस पर सदास्मृत आशुतोष की कलम से

चलिए उन लाचार गलियों में… होकर मजबूर यहां बिकते हैं मजदूर…

रहूं घर में तो पेट भरने की चिंता, ‘गर जाऊं बाहर तो सजती है चिता

 

सदास्मृत आशुतोष रंजन

बिंदास न्यूज, गढ़वा

 

गढ़वा : हजारों दर्द सीने में लिए बैठा हूं, ताज्जुब होता है फिर भी जिंदगी जिए बैठा हूं, आस नहीं मखमल  नसीब होने की, इसीलिए किस्मत की फटी चादर पर पैबंद सिए बैठा हूं। जी हां कुछ यही करुण हालात हैं झारखंड के मजदूरों की। जिनके नसीब में या तो बिकना लिखा है या मिटना। बस नहीं लिखा है तो जिंदगी में खुशी समेटना। तो चलिए आपको इस रिपोर्ताज के जरिए लिए चलते हैं गढ़वा और नजदीक से मजदूरों के हालात दिखाने की कोशिश करते हैं –

फिर भी हाथ खाली और पेट भूखे रहते हैं: हमारे एक अंगूठे की बदौलत उधर उनकी सियासत सजती है, इधर हम बाजार में सजते हैं, फिर भी हमारे हाथ खाली और पेट भूखे रहते हैं। यह कोरी हकीकत है गढ़वा की। जहां हर रोज मजदूरों की मंडी लगती है। जहां गांव से काम की आस लिए मजदूर उस मंडी में पहुंचते हैं। लेकिन अफसोस उनकी खरीदी नहीं होती और वह फिर खाली हाथ मायूस हो घर को लौट जाते हैं। क्या नौजवान, क्या वृद्ध, क्या महिलाएं सभी उस बाजार में बिकने के लिए अहले सुबह से दोपहर तक तैयार रहते हैं। जिसे खरीदार मिला वह उसके साथ काम को बढ़ चला। जिसे किसी ने नहीं खरीदा वह यूं ही बैठा रहा। यह बाजारू नियति आज दशकों से बनी हुई है। कसक भरे लहजे में मजदूर कहते हैं कि अगर किसी दिन संजोग से काम मिल भी गया तो वाजिब मजदूरी नहीं मिलती। मजदूरी की जगह मिलती है तो गाली और मार खाने की धमकी। साथ ही वह कहते हैं कोई नहीं सुनता ये हजूर हम गरीबों की। 

बाहर जाऊं तो सजती है चिता: घर में रहें तो पेट भरने की चिंता, ‘गर जाऊं बाहर तो सजती है चिता। एक यह तस्वीर भी आंकड़े सहित पैवस्त है मजदूर की राह में। पलामू का रांकी कला हो जहां एक साथ 23 मजदूरों की मौत, उधर गढ़वा का भगवान घाट जहां 30 मजदूरों की मौत। सारी व्यवस्था पर सवाल खड़ी करता है। कालांतर में कार्यान्वित हुई जवाहर रोजगार योजना, सुनिश्चित रोजगार योजना, काम के बदले अनाज योजना – इतनी सारी योजनाओं के बाद भी गांव में काम नहीं – मजदूरों के हाथ काम बिना खाली – व्यवस्था बाहर पलायन की – तब जाकर सरकार ने योजना को कानून बनाकर लागू किया नाम दिया मनरेगा। लेकिन फिर भी तो हालत जड़वत है। कल भी गांव से मजदूर काम के लिए पलायन करते थे आज भी उनके सामने पलायन की ही नियति बनी हुई है। नतीजा है किसी के हाथ रोटी आयी तो किसी के खाते में आई मौत। लेकिन विडंबना है की सारी वस्तु स्थिति के सदृश्य अवगत होने के बावजूद भी ना तो सरकार, ना ही सरकारी मुलाजिम किसी की नजर इस विषम समस्या की ओर नहीं जाती। नतीजतन रोजगार और भूखी क्षुधा की तृप्ति के लिए मजदूरों का पलायन बदस्तूर जारी है।

नहीं बदले हालात हमारे कहने को हुक्मरान हमारे रोज बदलते हैं। कुछ यूं कसक के साथ मजदूर आज सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर और कितना इंतजार करें खुद के हालात बदलने का। क्योंकि अविभाजित बिहार की बात हो या अलग हुए झारखंड की राज्य में सत्तासीन होने वाली हर सरकार बस एक ही संकल्प दोहराती है कि गांव के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचाना है। लेकिन वास्तविकता की धरातल पर नतीजा सिफर है। ऐसे में उस अंतिम व्यक्ति की यह सोच क्यों कर गलत है कि आखिर कब तलक बाजार में यूं बिकते और करके पलायन मिटते रहें हम… … …

Tags

About Author

Follow Us On Social Media