जस दुल्हा तस बनी बराता की हालत हो गई है राजनीति में

जस दुल्हा तस बनी बराता की हालत हो गई है राजनीति में

जैसे लोग प्रत्याशी व मतदाता होंगे वैसा ही चुना जाएगा नेता

8 दशकों से जारी हालात को बदलने के लिए एक एक मतदाता को वोट करना है जरूरी



दिवंगत आशुतोष रंजन

प्रियरंजन सिन्हा
बिंदास न्यूज, गढ़वा


गढ़वा : मानस की एक चौपाई है जस दूल्हा तस बनी बराता – यह किसी भी चुनाव के लिए बिल्कुल समीचीन पंक्तियां हैं। होता यह है कि जनमानस ने मान लिया है कि चुनाव ही नहीं राजनीति ही गंदी चीज हो गई है। इसमें सबका भाग लेना अनुकूल नहीं रहा। यह अवधारणा केवल राजनीति में आने के संदर्भ में काम नहीं करती बल्कि मतदान करने के संदर्भ में भी लोग इसी का अनुपालन करते हैं। नतीजा होता है कि राजनीति से निर्लिप्त रहने वाले लोग एवं उनके परिवार मतदान करना भी जरूरी नहीं समझते। बल्कि मतदान केंद्र पर शरीफों के जाने की जगह नहीं मानता। इसका नतीजा मतगणना के बाद चौक चौराहा, ओटा ओसारा, पान दुकान, चाय दुकान, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड आदि जैसे सार्वजनिक जगहों पर सुनने को मिलता है। गलत आदमी चुनकर आ गया! यह क्या हमारे मोहल्ले, हमारे शहर या इस क्षेत्र का विकास करेगा। निर्वाचित नेता को आरोपित करने से आपकी समस्या कभी दूर नहीं हो सकती। जिस तरह का प्रत्याशी मैदान में आएगा वह अपने तरह के तमाम मतदाताओं को सपरिवार ही नहीं इष्ट मित्रों एवं रिश्तेदारों के साथ मतदान में भाग लेने के लिए प्रेरित करेगा। वे मतदाता भी अपने आदमी को मत देने के लिए बड़ी संख्या में मतदान केंद्र पर जाएंगे। यहीं पर मानस की पंक्तियां चरितार्थ होती हैं जस दूल्हा तस बनी बराता यानि जिस तरह के लोग राजनीति में आएंगे चुनाव में अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करेंगे केवल उनके ही लोग मतदान करने जाएंगे तो वह अपने तरह के लोगों को ही चुनना पसंद करेंगे। अब चुनाव में आने वाला ही राजनीति को सेवा नहीं प्रोफेशन समझ कर मैदान में आया है तो चुनाव में जीतने के बाद उसका ध्यान केवल धन उगाही पर ही केंद्रित रहेगा। यदि अपराधी किस्म का नेता चुन कर आया है तो स्वाभाविक है कि उसके अपने लोग जिन्होंने उसे मतदान करके जिताया है वह अपराध की दुनिया में खुला खेल फर्रुखाबादी ही खेलेंगे। तब अपने हाथ में सार्वजनिक स्थलों पर खड़ा होकर पछताने एवं नेता जी के कार्यकलाप को कोसने के सिवा कुछ नहीं रह जाएगा। भारतीय संविधान में जिसे एक बार नेता चुन लिया जाता है उसे वापस बुलाने का कोई उपाय नहीं है। अगर है भी तो वह व्यवहारिक और आसान नहीं है। इसका बेहतर और एकमात्र विकल्प यही है कि जितने लोगों का नाम मतदाता सूची में दर्ज है वह निश्चित रूप से सारे काम छोड़कर अपनी सबसे बड़ी जिम्मेवारी समझकर मतदान करने जरूर जाएं। यही एकमात्र उपाय है कि व्यापक जनहित को आप सुनिश्चित कर सकते हैं। इससे तब एक रास्ता और खुलेगा अच्छे और सार्वजनिक हित में काम करने वाले लोग राजनीति में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करेंगे और इस क्षेत्र में शुचिता का समावेश होगा। नगर निकाय चुनाव की डुगडुगी बज चुकी है। इस मौके पर इस चौपाई को झुठलाने का प्रयास किया जाए। अच्छे और नेक लोग चुनावी मैदान में आएं और जब मतदान करने का समय आए तो एक-एक मतदाता मतदान केंद्र पर पहुंचकर 100% मतदान सुनिश्चित करें। वरना भारत की आजादी के 8 दशक से हम आप केवल चौक चौराहा एवं ओटा ओसारा पर बैठकर गलत उम्मीदवार को चुने जाने, राजनीति का अपराधीकरण, राजनीति को सेवा नहीं मेवा का क्षेत्र बन जाने की चर्चा कुचर्चा करते रहे हैं। जरूरत है कि संसदीय प्रणाली में हम सब की बेहतरी के लिए राजनीति में भाग लेना और मतदान में निश्चित रूप से सब का शामिल होना एकमात्र विकल्प है। वरना अपनी दशा और दिशा को लेकर पछताने के सिवा हमारे हाथ में कुछ नहीं रह जाएगा।

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Ashutosh Ranjan

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