पलामू में नीलगाय बनी बड़ी समस्या : सर्वे रिपोर्ट में चौंकाने वाले खुलासे

पलामू में नीलगाय बनी बड़ी समस्या : सर्वे रिपोर्ट में चौंकाने वाले खुलासे

वन विभाग तैयार कर रहा लॉन्ग टर्म प्लान



दिवंगत आशुतोष रंजन

प्रियरंजन सिन्हा
बिंदास न्यूज, गढ़वा


डालटनगंज : झारखंड के पलामू जिले में नीलगाय किसानों के लिए बड़ी समस्या बनी हुई है। जंगलों से निकलकर ये फसलों को भारी नुकसान पहुंचा रही हैं। हाल ही में कराए गए सर्वे की रिपोर्ट में नीलगाय के व्यवहार और भोजन संबंधी महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है। जिसके आधार पर वन विभाग लंबी अवधि की योजना बना रहा है। फिलहाल तत्काल राहत के रूप में वन समितियां ग्रामीणों की मदद करेंगी।

सर्वे में निकली महत्वपूर्ण जानकारी: वन विभाग के सर्वे में पता चला है कि नीलगाय खैर और बेर के पेड़ों के पत्तों को बहुत पसंद करती है। प्रभावित इलाकों में इन पेड़ों के जंगल लगाने की तैयारी चल रही है। पलामू के जंगल पहले खैर और बेर के लिए मशहूर थे। इसलिए यह दीर्घकालिक समाधान हो सकता है।


डीएफओ का बयान: सर्वे रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि नीलगाय प्रभावित जंगलों के आसपास बड़ी संख्या में मवेशी मौजूद हैं। ये मवेशी नीलगाय का प्राकृतिक भोजन खा जाते हैं। जिससे नीलगाय जंगलों से बाहर निकलकर खेतों में घुस जाती है। रिपोर्ट जल्द ही आधिकारिक रूप से जारी की जाएगी।

पलामू जिले में नीलगाय के कारण बड़े पैमाने पर खेती की क्षति होती है। इसका सबसे बड़ा कारण है कि जंगल के अगल-बगल में मवेशी बड़ी संख्या में नीलगाय के भोजन को खा जाते है। नीलगाय जब भी आबादी वाले क्षेत्रों में आती है तो ग्रामीणों की कोशिश होती है कि उसे वापस जंगल में भेज दिया जाए। इस बार कोशिश की गई है कि नीलगाय को जंगल में वापस भेजने में वन समितियां मदद करेंगी। वन समितियों के खाते में पैसे भेजे जाएंगे। वन समितियां नीलगाय को जंगल में वापस भेजने के लिए स्पेशल ड्राइव चलाएंगी। हाथी के लिए भी इस राशि का इस्तेमाल किया जाएगा। नीलगाय को ध्यान में रखकर खैर एवं बेर के पेड़ भी लगाने की तैयारी है – सत्यम कुमार, डीएफओ, पलामू

57 वन समितियों को 1.57 करोड़ रुपये जारी: पलामू जिले में करीब 700 वन समितियां हैं। इनमें से 57 वन समितियां नीलगाय से निपटने के लिए सक्रिय रूप से काम करेंगी और किसानों की मदद करेंगी। नीलगाय को जंगलों में वापस भगाने के लिए इन समितियों को 1.57 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं। यह समितियां विशेष ड्राइव चलाएंगी। इसी राशि का इस्तेमाल हाथी संबंधी समस्याओं में भी किया जाएगा। डीएफओ सत्यम कुमार ने बताया, “नीलगाय को जंगल में वापस भेजने में वन समितियां ग्रामीणों की मदद करेंगी। साथ ही नीलगाय को ध्यान में रखकर खैर और बेर के पेड़ लगाने की भी तैयारी है।”

1.54 लाख हेक्टेयर भूमि प्रभावित: पलामू में नीलगाय से करीब 1.54 लाख हेक्टेयर जमीन प्रभावित है। सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों में हुसैनाबाद, हैदरनगर, मोहम्मदगंज, पांडू, बिश्रामपुर, सदर प्रखंड, छतरपुर और नावाबाजार शामिल हैं। सोन और कोयल नदी के तटवर्ती इलाकों में नीलगाय की संख्या सबसे अधिक है। 2024-25 में वन विभाग ने नीलगाय से फसल नुकसान के मामलों में 62.7 लाख रुपये मुआवजा जारी किया। प्रति हेक्टेयर मुआवजे का प्रावधान 10,833 रुपये से 21,666 रुपये तक है। कई किसान नेशनल हाईवे और स्टेट हाईवे पर नीलगाय के कारण दुर्घटनाओं का शिकार भी हो चुके हैं।

नीलगायों की समस्या संसद तक पहुंची: नीलगाय का मुद्दा लोकसभा और झारखंड विधानसभा में कई बार उठ चुका है। हर विधानसभा सत्र में पलामू प्रमंडल क्षेत्र में खेती को हो रहे नुकसान पर चर्चा होती है। वन विभाग अब सर्वे रिपोर्ट के आधार पर वर्किंग प्लान तैयार कर रहा है। जिसमें जंगलों में पानी के स्रोत, घास की उपलब्धता और नीलगाय के प्रवास को नियंत्रित करने के उपाय शामिल होंगे।

यह समस्या मानव वन्यजीव संघर्ष का हिस्सा है। जिसमें पत्थर खनन और अन्य कारकों से भी जंगलों का क्षेत्र प्रभावित हो रहा है। विभाग की दीर्घकालिक योजना से किसानों को स्थायी राहत मिलने की उम्मीद है।

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