प्रभात मिश्रा की कलम से


आशुतोष रंजन
गढ़वा

11 जनवरी 1927 को डालटनगंज आए थे महात्मा गांधी,नोआखली में यदु बाबू साथ थे तो निधन के दिन जगनारायण पाठक वहां पहुंचे थे

जीवन के अंत तक कायम रहा जुड़ाव: आजादी की लड़ाई में वर्तमान के झारखंड और तत्कालीन बिहार के जिन शहरों में महात्मा गांधी का आगमन हुआ था उनमें से डालटनगंज (अब मेदिनीगर) भी एक था,डालटनगंज आने के बाद उनका यहां के लोगों से ऐसा जुड़ाव हुआ कि वह उनके जीवन के अंत तक बना रहा,बापू का आगमन 11 जनवरी 1927 को हुआ था,यहां के अग्रणी स्वतंत्रता सेनानी यदुवंश सहाय “यदु बाबू” इस दिन के करीब 20 साल बाद उनके साथ नोआखली में थे,वह उनके साथ यहां 20 से लेकर 30 जनवरी तक रहे थे,30 जनवरी 1948 को जब नई दिल्ली में बापू की हत्या हुई थी तो उस दिन स्वतंत्रता सेनानी जगनारायण पाठक घटना के कुछ देर बाद पहुंचे थे और गांधीजी के पार्थिव शरीर का दर्शन किया था।

इसीलिए उस मैदान का नाम गांधी मैदान हुआ: आजादी की लड़ाई के अगुआ का शहर में दो जगह स्वागत किया गया था। एक जगह के सम्मानपत्र में ‘पलामू की दरिद्र जनता’ लिखा हुआ है तो दूसरे में ‘सदस्य, डालटनगंज म्युनिसिपलबोर्ड’। यहां आने पर गांधी जी मारवाड़ी सार्वजनिक हिंदी पुस्तकालय भी गए थे। यहां उनके साथ डा. राजेंद्र प्रसाद भी थे। दोनों ने पुस्तकालय में अपना संदेश भी लिखा था। गांधी जी ने रेलवे स्टेशन के नजदीक मैदान में हजारों लोगों को संबोधित किया और आजादी की लड़ाई में उनसे सहयोग की अपेक्षा की। जवाब में लोगों ने ‘वंदेमातरम’, ‘भारत माता की जय’, ‘गांधी जी की जय’ के नारे लगाए और उन्हें हरकदम पर साथ देने का वचन दिया। इसका परिणाम पलामू में चले स्वतंत्रता संग्राम के विभिन्न चरणों से लगाया जा सकता है। यहां के लोगों ने सविनय अवज्ञा आंदोलन से लेकर 1942 के ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ आंदोलन में कंधे से कंधा मिलाकर भाग लिया। जिस मैदान में सभा हुई थी, उसे गांधी मैदान के नाम से जाना जाता है। डालटनगंज में वे सेठ सागर मल सर्राफ के बगीचे में रुके थे।

उपवास रखी मुस्लिम महिला से हुई मुलाकात: गांधी जी के साथ नोआखली में रहे संविधान सभा के सदस्य और दक्षिण पश्चिम पलामू साधाराण ग्रामीण के विधायक यदुवंश सहाय ने अपनी डायरी में 20 जनवरी को लिखा था, ‘2बजे रात फेनी स्टेशन पर उतरा,एक मजिस्ट्रेट साहब हमलोगों को लेने के लिए स्टेशन पर आये थे,नजदीक ही डाक बंगला में जाकर ठहरा,भोर में तैयार हो गया,S.D.O. Feni आकर मिले और उनके साथ A‍bdullah S.P.भी थे,एक साथ नास्ता किया,S.P. अपने जीप में शिरौंधी से एक मील दूर ले आये,जमीन काफी उपजाऊ, जनता खुशहाल,पैदल चलकर शिरौंधी पहुंचा,बड़ा ही सुन्दर और शांत जगह है,इसी गांव में मुस्लिम महिला का दर्शन किया जो 24 दिन से उपवास किये हुये है,आज संध्या को उपवास तोड़ा,गांव और अगल-बगल के मुसलमान भाइयों की काफी जायदाद है।

बापू ने समाप्त कराया था उस महिला का उपवास: इस महिला का नाम बीबी अमतुस्सलाम है,जब वह बापू के साथ नोआखली आईं तो इस गांव में पहुंचने पर उन्हें पता चला कि एक मंदिर से दुर्गा जी की मूर्ति के पास रखी तलवार चुरा ली गई है,इसे लेकर हिंदुओं में काफी आक्रोश है और पूरे इलाके में तनाव है,वह हर हाल में हिंदू-मुस्लिम में सौहार्द की वापसी और विश्वास बहाली चाहतीं थी,इसके बाद उन्होंने मुसलमानों से तलवार वापस करने की अपील की और ऐसा नहीं होने पर उपवास पर बैठ गईं,काफी जद्दोजहद के बाद आखिर में तलवार लौटाई जाती है,इसके बाद महात्मा गांधी उनका उपवास तुड़वाते हैं।

यहां झोपड़ी से निकल कर शांत खड़े हो गए थे बापू: 26 जनवरी को गांधी जी बानसा में थे,इस दिन के बारे में यदु बाबू ने लिखा था,यात्रा के समय हीरापुर में वन्दे मातरम गान शुरू हुआ,गांधी जी अपनी झोपड़ी से निकल कर शान्ति से खड़े रहे,रास्ते में सरदार निरंजन सिंह ने कदम से कदम बढ़ाये जा गाया,इस गांव में पहुंच कर झंडा फहराया गया और प्रतिज्ञा पत्र पढ़ा गया,मैंने झंडा फहराया और Abdul Mohmmad साहब ने प्रतिज्ञा पत्र पढ़ा।

बापू को रास नहीं आया मॉडल हाउस: 30 जनवरी को यानी अपने निधन से ठीक एक साल पहले गांधी जी अमकी में थे,उस दिन के बारे में यदु बाबू ने लाखा है,सरकार द्वारा यहां एक model house बनाया गया है, 234 रु. में,बापू ने इसे पसंद नहीं किया,टीन के छत और टीन के दिवार बहुत गर्म होंगे,बापू का कहना है कि बांस,फूस,घास और लकड़ियों के इनके घर हैं,वैसा ही बना दो,खर्च भी ज़्यादा नहीं और आराम भी।

पाठक जी पहुंचते तब तक हो गई बापू की हत्या: जिस दिन नई दिल्ली में प्रार्थना सभा के दौरान गांधी जी की हत्या हुई थी उस दिन पलामू के जगनारायण पाठक वहीं थे,वह जबतक प्रार्थना सभा में पहुंचते तबतक बापू की हत्या हो चुकी थी,उन्होंने अपने रिश्ते के पोते आशुतोष पाठक को बताया था कि मेरे पहुंचने के पहले वहां प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल पहुंच चुके थे,वहां का माहौल सन्नाटे वाला था,आगे पं. नेहरू और सरदार पटेल खड़े थे तो पीछे मैं।

आइए पलामू से जुड़ी बापू की यादों के सहारे हम उन्हें उनकी जयंती पर श्रद्धांजलि दें।

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